भारत त्योहारों का देश है, और दक्षिण भारत में ‘पोंगल’ का वही महत्व है जो उत्तर भारत में मकर संक्रांति का। पोंगल केवल एक फसल उत्सव (Harvest Festival) नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, सूर्य देव और पशुधन के प्रति आभार प्रकट करने का एक माध्यम है।
तमिल कैलेंडर के अनुसार, जब सूर्य ‘धनु’ राशि से निकलकर ‘मकर’ राशि में प्रवेश करता है, तब ‘तइ’ (Thai) महीने की शुरुआत होती है। चार दिनों तक चलने वाला यह उत्सव खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक है। आइए जानते हैं पोंगल के इन चार विशेष दिनों का महत्व और उन्हें मनाने के पारंपरिक तरीके।
पहला दिन – भोगी पोंगल (Bhogi Pongal)
यह दिन देवराज इंद्र को समर्पित है, जिन्हें वर्षा का देवता माना जाता है। भोगी का अर्थ है पुरानी चीजों का त्याग कर नए जीवन का स्वागत करना।
मनाने का पारंपरिक तरीका
- भोगी मंटालू – इस दिन लोग अपने घरों की सफाई करते हैं और पुरानी, अनुपयोगी चीजों को सुबह के समय आग (अलाव) में जलाते हैं। यह बुराई और पुरानी आदतों के अंत का प्रतीक है।
- घरों को ताजे फूलों और आम के पत्तों (तोरण) से सजाया जाता है।
- कोलम – घर के आंगन में सुंदर ‘कोलम’ (रंगोली) बनाई जाती है।
दूसरा दिन – सूर्य पोंगल (Surya Pongal)
यह मुख्य पोंगल है, जो भगवान सूर्य को समर्पित है। इस दिन सूर्य देव को नई फसल का भोग लगाया जाता है।
मनाने का पारंपरिक तरीका
- मिट्टी का बर्तन – एक नए मिट्टी के बर्तन को हल्दी और कुमकुम से सजाया जाता है। इसके गले पर ताजी हल्दी के पौधे बांधे जाते हैं।
- पोंगल बनाना – खुले आंगन में दूध और चावल को उबाला जाता है। जब दूध बर्तन से बाहर उफनने लगता है, तो घर के सभी सदस्य खुशी से “पोंगालो पोंगल” चिल्लाते हैं। इसका अर्थ है – “हमारी खुशियां भी इसी तरह उफनती रहें।”
- प्रसाद – इस मीठे चावल (सक्करई पोंगल) को सूर्य देव को अर्पित किया जाता है।
तीसरा दिन – मट्टू पोंगल (Mattu Pongal)
खेती में बैलों और गायों का विशेष महत्व होता है। यह दिन इन मूक पशुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का है।
मनाने का पारंपरिक तरीका
- पशुओं का श्रृंगार – गायों और बैलों को नहलाया जाता है। उनके सींगों को चमकीले रंगों से रंगा जाता है और गले में घंटियां व फूलों की मालाएं बांधी जाती हैं।
- पूजा – पशुओं को विशेष पोंगल खिलाया जाता है और उनकी आरती उतारी जाती है।
- जल्लीकट्टू – तमिलनाडु के कई गांवों में इस दिन ‘जल्लीकट्टू’ (सांडों को वश में करने वाला खेल) का आयोजन किया जाता है, जो साहस का प्रतीक है।
चौथा दिन – कनुम पोंगल (Kaanum Pongal)
‘कनुम’ का अर्थ है ‘देखना’ या ‘मिलना’। यह दिन परिवार और सामाजिक मेलजोल के लिए समर्पित है।
मनाने का पारंपरिक तरीका
- कनु पिड़ी – महिलाएं सुबह जल्दी स्नान करके हल्दी के पत्तों पर बचा हुआ पोंगल, चावल और गन्ना रखती हैं। वे अपने भाइयों की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करती हैं।
- पारिवारिक मिलन – लोग अपने रिश्तेदारों और दोस्तों के घर जाते हैं। बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद लिया जाता है और उपहारों का आदान-प्रदान होता है।
- पर्यटन – इस दिन लोग समुद्र तट (Beach) या पार्कों में घूमने जाते हैं और पूरा दिन आनंद के साथ बिताते हैं।
पोंगल के व्यंजन – स्वाद और स्वास्थ्य का संगम
पोंगल में गन्ने का विशेष महत्व है। मुख्य व्यंजनों में:
- वेन पोंगल – मूंग दाल और चावल से बना नमकीन पोंगल, जिसमें काली मिर्च और जीरे का तड़का होता है।
- सक्करई पोंगल – गुड़, घी और सूखे मेवों से बना मीठा पोंगल।
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