श्री कल्कि चालीसा PDF हिन्दी
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श्री कल्कि चालीसा हिन्दी Lyrics
भगवान विष्णु के दसवें और अंतिम अवतार, श्री कल्कि को समर्पित श्री कल्कि चालीसा का पाठ (Kalki Chalisa PDF) भक्तों के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कलियुग के अंत में अधर्म का विनाश और सत्ययुग की स्थापना के लिए कल्कि अवतार का अवतरण होगा।
इस चालीसा के नियमित पठन से मन को शांति मिलती है, नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और साधक में साहस का संचार होता है। यदि आप भी निष्काम भक्ति और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करना चाहते हैं, तो Kalki Chalisa PDF हमारी वेबसाइट से डाउनलोड करें। यह संग्रह शुद्ध वर्तनी और सरल भाषा में उपलब्ध है, ताकि आप प्रभु की स्तुति का पूर्ण लाभ उठा सकें।
|| श्री कल्कि चालीसा (Kalki Chalisa PDF) ||
॥ दोहा ॥
कल्कि कल्कि नाम बिनु,
मिलता नहीं कल्याण।
पूजो जपो भजो नित,
श्री कल्कि का नाम॥
युगाचार्य कहते सुनो,
इस धरती के लोग।
कल्कि भगवत कृपा बिनु,
नहीं छूटत भवरोग॥
॥ चोपाई ॥
कल्कि नाम है जग उजियारा ।
भक्तजनों को अतिशय प्यारा॥
जो कल्कि का नाम पुकारे।
उसको मिलते सभी सहारे॥
संकट हरे मिटे सब पीरा।
जो विश्वाश करे घरि धीरा॥
जय कल्कि जय जगत्पते।
पदमा पति जय रमापते॥
नाम जाप कलि काल विनाशा।
भक्तजनों की फलती आशा॥
नाम जाप सब दुःख हरंता।
गावहिं वेद शास्त्र अति संता॥
कल्कि सब देवन के देवा।
सभी देवता करते सेवा॥
कल्कि कल्कि जो भजते हैं।
कल्कि सर्व संकट हरते हैं॥
नाम संजीवन मूल है कल्कि।
इच्छा पूरण करता है सबकी॥
यथा समय अवतार पठाए।
कलयुग में कल्कि जी आए॥
कलि का नाश करेंगे कल्कि।
पूर्ति करेंगे अपनेपन की॥
तन-मन-धन न्योछावर कीजे।
सदा बोलिए कल्कि की जय॥
असुर निकन्दन भव-भय-भंजन।
कलिमल नाशन निज-जन-रंजन॥
संत मुनि जन करते वन्दन।
ब्रह्मादिक करते अभिनन्दन॥
अश्व चढ़े हैं खड्ग धरे हैं।
प्रकृति ब्रह्म से पूर्ण परे हैं॥
होगा अब कलि काल समापन।
सतयुग का होगा आवाहन॥
घिरा जगत में सघन अँधेरा।
म्लेच्छ जनों ने डाला घेरा॥
है अधर्म का चहुँदिशी फेरा।
कलियुग का चहुँतरफा डेरा॥
गंगा यमुना हुई अपावन।
गौ ब्राह्मन लागे दुःख पावन॥
दुखिया भारत तुम्हें पुकारे।
प्रकटो कल्कि नाथ हमारे॥
अब तो लेहु प्रभु अवतारा।
दुःखी हो रहा धर्म बेचारा॥
देख रहे हो दशा आज की।
प्रगटो युग परिवर्तन कल्कि॥
होता वेद धर्म अपमाना।
सब करते अपना मन माना
कल्कि जी का खड्ग चलेगा।
कोई अधर्मी नहीं बचेगा॥
धर नृसिंह रूप जब आए।
भक्त प्रहलाद के प्राण बचाए॥
वामन का लेकर अवतारा।
बलि का नाश किया छल सारा॥
हरी अवतार लीन प्रभु जब ही।
मुक्त गजेन्द्र भयो प्रभु तब ही॥
जब रावण अन्याय पसारा।
रामरूप तब था प्रभु धारा॥
राक्षस मार असुर संहारे।
समी संतजन मये सुखारे॥
कंस कौरवों का आतंका।
धरमग्लानी की भारी शंका॥
सब मिल कीन्हि धरा अपावन।
केशव रूप घरा मन भावन॥
निष्कलंक होगी जब धरती।
धर्म लता दिखेगी फलती॥
कल्कि जी में ध्यान जो लावे।
बंधन मुक्त महासुख पावे॥
कल्कि कीर्तन भजन जो गावे।
छूटे मोह परमपद पावे॥
इष्टदेव कल्कि अवतारा।
ब्रह्मादिक को पावे पारा॥
कल्कि नाम विदित संसारा।
कर दो कल्कि जग उजियारा॥
खलदल मारि करहु सुधारा।
भूमिभार उतारन हारा॥
कल्कि रूप अनादि अनन्ता।
जाके गुण गावहि श्रुति संता॥
जो यह गावे कल्कि चालीसा।
होए सिद्धि पूरन सब इच्छा॥
जय कल्कि जय जगत बिहारी।
मंगल भवन अमंगल हारी॥
॥ दोहा ॥
विघ्न हरण मंगल करन,
श्री कल्कि जी भगवान।
निज सेवा भक्ति दीयो
चरणों में रहने का वरदान॥
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