कूष्माण्डा माता व्रत कथा पूजा विधि PDF हिन्दी
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Durga Ji ✦ Vrat Katha (व्रत कथा संग्रह) ✦ हिन्दी
कूष्माण्डा माता व्रत कथा पूजा विधि हिन्दी Lyrics
कूष्माण्डा माता नवदुर्गा का चौथा स्वरूप मानी जाती हैं। इन्हें ब्रह्माण्ड की सृष्टि करने वाली आदिशक्ति कहा जाता है। मान्यता है कि अपनी मंद मुस्कान से इन्होंने ब्रह्माण्ड की रचना की, इसलिए इन्हें कूष्माण्डा कहा गया। इनके आठ हाथ होने के कारण इन्हें अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है। भक्त नौ दिन के नवरात्र व्रत में चौथे दिन माता कूष्माण्डा की पूजा करते हैं। पूजन में दीपक, पुष्प, गंध, नारियल, कलश और मालपुए का विशेष महत्व होता है। कूष्माण्डा माता की कृपा से आयु, आरोग्य, समृद्धि और शक्तियों की प्राप्ति होती है तथा जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
|| कूष्माण्डा व्रत कथा (Kushmanda Vrat Katha PDF) ||
कूष्माण्डा देवी की आठ भुजाएं हैं, इसलिए अष्टभुजा कहलाईं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमण्डल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा हैं। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जप माला है।
इस देवी का वाहन सिंह है और इन्हें कुम्हड़े की बलि प्रिय है। संस्कृति में कुम्हड़े को कूष्माण्ड कहते हैं इसलिए इस देवी को कूष्माण्डा। इस देवी का वास सूर्यमंडल के भीतर लोक में है। सूर्यलोक में रहने की शक्ति क्षमता केवल इन्हीं में है। इसीलिए इनके शरीर की कांति और प्रभा सूर्य की भांति ही दैदीप्यमान है। इनके ही तेज से दसों दिशाएं आलोकित हैं। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में इन्हीं का तेज व्याप्त है।
अचंचल और पवित्र मन से नवरात्रि के चौथे दिन इस देवी की पूजा-आराधना करना चाहिए। इससे भक्तों के रोगों और शोकों का नाश होता है तथा उसे आयु, यश, बल और आरोग्य प्राप्त होता है। ये देवी अत्यल्प सेवा और भक्ति से ही प्रसन्न होकर आशीर्वाद देती हैं। सच्चे मन से पूजा करने वाले को सुगमता से परम पद प्राप्त होता है।
विधि-विधान से पूजा करने पर भक्त को कम समय में ही कृपा का सूक्ष्म भाव अनुभव होने लगता है। ये देवी आधियों-व्याधियों से मुक्त करती हैं और उसे सुख-समृद्धि और उन्नति प्रदान करती हैं। अंततः इस देवी की उपासना में भक्तों को सदैव तत्पर रहना चाहिए।
|| कूष्माण्डा पूजा विधि ||
- इस दिन भी आप सबसे पहले कलश और उसमें उपस्थित देवी-देवता की पूजा करें।
- फिर देवी की प्रतिमा के दोनों तरफ विराजमान देवी-देवताओं की पूजा करें।
- इनकी पूजा के पश्चात देवी कूष्मांडा की पूजा करें। पूजा की विधि शुरू करने से पहले हाथों में फूल लेकर देवी को प्रणाम कर
- इस मंत्र ‘सुरासम्पूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्मांडा शुभदास्तु मे।’ का ध्यान करें।
- इसके बाद शप्तशती मंत्र, उपासना मंत्र, कवच और अंत में आरती करें। आरती करने के बाद देवी मां से क्षमा प्रार्थना करना न भूलें।
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