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महामृत्युंजय मंत्र क्यों है इतना खास? जानिए इसकी शक्ति, लाभ और वास्तविक अर्थ

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महा मृत्युंजय मंत्र, ऋग्वेद का एक प्राचीन श्लोक है, जो भगवान शिव को समर्पित है। यह मंत्र न केवल मृत्यु पर विजय का प्रतीक है बल्कि जीवन, मृत्यु और मोक्ष के गहन दर्शन को भी प्रतिबिंबित करता है।

हिंदू धर्म में, इस मंत्र को अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है और इसे विभिन्न अनुष्ठानों में उपयोग किया जाता है। नियमित रूप से इस मंत्र का जाप करने से व्यक्ति शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार के साथ-साथ आध्यात्मिक विकास भी प्राप्त कर सकता है।

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे

सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।

उर्वारुकमिव बन्धनान्

मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥

महामृत्युंजय मंत्र, जिसे त्रयंबकम मंत्र भी कहते हैं, एक बहुत ही पुराना और पवित्र मंत्र है। इसे ऋग्वेद में लिखा गया है। एक ऐसा मंत्र है जो मृत्यु के बंधनों से मुक्ति दिलाता है।

यह मंत्र भगवान शिव के उस रूप का ध्यान कराता है जो मृत्यु पर विजय प्राप्त कर चुका है। ऋग्वेद में वर्णित यह मंत्र, त्रयंबकम मंत्र के नाम से भी जाना जाता है और गायत्री मंत्र के साथ, हिंदू धर्म में सबसे अधिक महत्व रखता है।

इस मंत्र के कई नाम और रूप हैं

इस मंत्र को शिव के उग्र रूप का संकेत देते हुए रुद्र मंत्र, शिव के तीन नेत्रों के कारण त्र्यंबकम मंत्र और प्राचीन ऋषि शुक्र को दी गई जीवन देने वाली विद्या का एक हिस्सा होने के कारण मृत्युंजय मंत्र भी कहा जाता है। ऋषि-मुनियों ने इसे वेद का हृदय माना है। ध्यान और चिंतन के लिए उपयोग किए जाने वाले सभी मंत्रों में, गायत्री मंत्र के साथ इस मंत्र का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है। यह मंत्र मृत्यु पर विजय प्राप्त करने और अमरत्व प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करने के लिए किया जाता है।

मूल मंत्र

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ॥

अर्थ

  • ॐ: यह एक पवित्र ध्वनि है जिसका उपयोग ध्यान और मंत्र जाप में किया जाता है।
  • त्र्यम्बकं: तीन नेत्र वाले भगवान शिव।
  • यजामहे: हम पूजते हैं या आराधना करते हैं।
  • सुगन्धिं: सुगंधित या सुखद।
  • पुष्टिवर्धनम्: जो पोषण करता है और वृद्धि करता है।
  • उर्वारुकमिव: ककड़ी की तरह।
  • बन्धनात्: बंधन से।
  • मृत्योर्मुक्षीय: मृत्यु से मुक्त करें।
  • माऽमृतात्: अमरत्व से नहीं, बल्कि मृत्यु से।

सरल अर्थ

हे तीन नेत्र वाले भगवान शिव, हम आपकी आराधना करते हैं। आप जीवन को सुखद और समृद्ध बनाते हैं। जैसे ककड़ी का फल अपने पौधे से अलग हो जाता है, वैसे ही हम भी इस संसार के बंधनों से मुक्त होकर आपकी शरण में आएं। हम अमरत्व नहीं चाहते, बल्कि मृत्यु के भय से मुक्त होना चाहते हैं।

महामृत्युंजय मंत्र का अर्थ

  • सम्पूर्ण संसार के पालनहार, तीन नेत्रों वाले शिव की हम अराधना करते हैं। जो भगवान शिव संसार में सुगंध फैलाते हैं, वे हमें मृत्यु के बंधनों से मुक्त कर दें और मोक्ष प्रदान करें।
  • महामृत्युंजय मंत्र के अक्षरों का अर्थ विस्तृत है। इस मंत्र के छह अंग होते हैं: वर्ण, पद, वाक्य, चरण, ऋचा और सम्पूर्ण ऋचा, जिनके अलग-अलग अभिप्राय होते हैं।
  • ओम त्र्यम्बकम मंत्र के 33 अक्षर हैं, जो महर्षि वशिष्ठ के अनुसार 33 कोटि देवताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • इन 33 देवताओं में 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य, 1 प्रजापति और 1 षट्कर हैं।
  • इन 33 कोटि देवताओं की सम्पूर्ण शक्तियाँ महामृत्युंजय मंत्र में निहित होती हैं। इस मंत्र का पाठ करने वाला व्यक्ति दीर्घायु, निरोगी, ऐश्वर्यवान और धनवान होता है।
  • महामृत्युंजय मंत्र का पाठ करने वाला व्यक्ति हर दृष्टि से सुखी और समृद्धिशाली होता है। भगवान शिव की अमृतमयी कृपा उस पर निरंतर बरसती रहती है।

अक्षरों के स्थान और उनके देवता

  • त्रि: ध्रुव वसु प्राण का सूचक है, जो सिर में स्थित है।
  • यम: अध्वर वसु प्राण का सूचक है, जो मुख में स्थित है।
  • ब: सोम वसु शक्ति का सूचक है, जो दक्षिण कान में स्थित है।
  • कम: जल वसु देवता का सूचक है, जो बाएँ कान में स्थित है।
  • य: वायु वसु का सूचक है, जो दक्षिण बाहु में स्थित है।
  • जा: अग्नि वसु का सूचक है, जो बाएँ बाहु में स्थित है।
  • म: प्रत्युष वसु शक्ति का सूचक है, जो दक्षिण बाहु के मध्य में स्थित है।
  • हे: प्रयास वसु मणिबंध में स्थित है।
  • सु: वीरभद्र रुद्र प्राण का सूचक है, जो दक्षिण हाथ की उंगलियों के मूल में स्थित है।
  • ग: शुम्भ रुद्र का सूचक है, जो दक्षिण हाथ की उंगलियों के अग्र भाग में स्थित है।
  • न्धिम्: गिरीश रुद्र शक्ति का मूल सूचक है, जो बाएँ हाथ के मूल में स्थित है।
  • पु: अजैक पात रुद्र शक्ति का सूचक है, जो बाएँ हाथ के मध्य भाग में स्थित है।
  • ष्टि: अहर्बुध्न्य रुद्र का सूचक है, जो बाएँ हाथ के मणिबंध में स्थित है।
  • व: पिनाकी रुद्र प्राण का सूचक है, जो बाएँ हाथ की उंगलियों के मूल में स्थित है।
  • र्ध: भवानीश्व रुद्र का सूचक है, जो बाएँ हाथ की उंगलियों के अग्र भाग में स्थित है।
  • नम्: कपाली रुद्र का सूचक है, जो उरु मूल में स्थित है।
  • उ: दिक्पति रुद्र का सूचक है, जो यक्ष के घुटने में स्थित है।
  • र्वा: स्थाणु रुद्र का सूचक है, जो यक्ष के टखने में स्थित है।
  • रु: भर्ग रुद्र का सूचक है, जो चक्र पाद अंगुलि के मूल में स्थित है।
  • क: धाता आदित्य का सूचक है, जो यक्ष के पाद अंगुलियों के अग्र भाग में स्थित है।
  • मि: अर्यमा आदित्य का सूचक है, जो बाएँ उरु मूल में स्थित है।
  • व: मित्र आदित्य का सूचक है, जो बाएँ घुटने में स्थित है।
  • ब: वरुण आदित्य का सूचक है, जो बाएँ टखने में स्थित है।
  • न्धा: अंशु आदित्य का सूचक है, जो बाएँ पाद अंगुलि के मूल में स्थित है।
  • नात्: भग आदित्य का सूचक है, जो बाएँ पैर की उंगलियों के अग्र भाग में स्थित है।
  • मृ: विवस्वन (सूर्य) का सूचक है, जो दाएँ पार्श्व में स्थित है।
  • र्त्यो: दण्ड आदित्य का सूचक है, जो बाएँ पार्श्व भाग में स्थित है।
  • मु: पूषा आदित्य का सूचक है, जो पीठ में स्थित है।
  • क्षी: पर्जन्य आदित्य का सूचक है, जो नाभि स्थल में स्थित है।
  • य: त्वष्टा आदित्य का सूचक है, जो गुह्य भाग में स्थित है।
  • मां: विष्णु आदित्य का सूचक है, जो शक्ति स्वरूप दोनों भुजाओं में स्थित है।
  • मृ: प्रजापति का सूचक है, जो कंठ भाग में स्थित है।
  • तात्: अमित वषट्कार का सूचक है, जो हृदय प्रदेश में स्थित है।

उपरोक्त वर्णन किए गए स्थानों पर देवता, वसु, आदित्य आदि अपनी सम्पूर्ण शक्तियों सहित विराजमान हैं। जो प्राणी श्रद्धा सहित महामृत्युंजय मंत्र का पाठ करता है, उसके शरीर के अंग- अंग की रक्षा होती है, जहां जो देवता या वसु अथवा आदित्य विराजमान होते हैं। मंत्र के पदों की शक्तियाँ जिस प्रकार मंत्र के अलग-अलग वर्णों (अक्षरों) की शक्तियाँ हैं, उसी प्रकार अलग-अलग पदों की भी शक्तियाँ होती हैं।

मंत्र के पदों की शक्ति

  • त्र्यम्बकम: त्रैलोक्यक शक्ति का बोध कराता है, जो सिर में स्थित है।
  • यजा: सुगंधात शक्ति का सूचक है, जो ललाट में स्थित है।
  • महे: माया शक्ति का द्योतक है, जो कानों में स्थित है।
  • सुगन्धिम्: सुगंधि शक्ति का द्योतक है, जो नासिका (नाक) में स्थित है।
  • पुष्टि: पुरंदिरी शक्ति का द्योतक है, जो मुख में स्थित है।
  • वर्धनम: वंशकरी शक्ति का द्योतक है, जो कंठ में स्थित है।
  • उर्वा: ऊर्ध्वेक शक्ति का द्योतक है, जो हृदय में स्थित है।
  • रुक: रुक्तदवती शक्ति का द्योतक है, जो नाभि में स्थित है।
  • मिव: रुक्मावती शक्ति का बोध कराता है, जो कटि भाग में स्थित है।
  • बन्धानात्: बर्बरी शक्ति का द्योतक है, जो गुह्य भाग में स्थित है।
  • मृत्यो: मंत्रवती शक्ति का द्योतक है, जो उरु प्रदेश में स्थित है।
  • मुक्षीय: मुक्तिकरी शक्ति का द्योतक है, जो घुटनों में स्थित है।
  • मा: माशक्ति सहित महाकालेश का बोधक है, जो दोनों जंघाओं में स्थित है।
  • अमृतात: अमृतवती शक्ति का द्योतक है, जो पैरों के तलुओं में स्थित है।

महामृत्युंजय मंत्र के लाभ

कलियुग में शिवजी की पूजा सभी प्रकार के पापों और कष्टों का नाश करने वाली है:

“कलौकलिमल ध्वंसक सर्वपाप हरं शिवम्।

येर्चयन्ति नरा नित्यं तेपिवंद्या यथा शिवम्॥”

कलियुग में शिवजी की पूजा सभी पापों को हरने वाली है। जो व्यक्ति नित्य शिवजी की आराधना करते हैं, वे शिवजी के समान वंदनीय होते हैं।

“स्वयं यजनित चद्देव मुत्तेमा सद्गरात्मवजै:।

मध्यचमा ये भवेद मृत्यैतरधमा साधन क्रिया॥”

जो व्यक्ति स्वयं महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हैं, वे महान पुण्यात्मा बनते हैं। इस मंत्र का मध्याह्न में जाप करना मृत्यु और अन्य कष्टों से मुक्ति दिलाता है।

“देव पूजा विहीनो य: स नरा नरकं व्रजेत।

यदा कथंचिद् देवार्चा विधेया श्रध्दायान्वित॥”

जो व्यक्ति देव पूजा से विहीन हैं, वे नरक में जाते हैं। अतः किसी भी प्रकार से, चाहे जैसे भी, श्रद्धा सहित देवों की पूजा करनी चाहिए।

“जन्मचतारात्र्यौ रगोन्मृदत्युतच्चैरव विनाशयेत्।”

महामृत्युंजय मंत्र का पाठ चार जन्मों तक के रोगों और कष्टों का नाश करता है।

कलियुग में केवल शिवजी की पूजा फल देने वाली है। जो लोग नित्य महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हैं, वे शिवजी के समान वंदनीय होते हैं। स्वयं यज्ञ करने से देवता और सद्गुरु की कृपा प्राप्त होती है। जो लोग देव पूजा के बिना रहते हैं, वे नरक में जाते हैं। अतः श्रद्धा सहित देवों की पूजा आवश्यक है। जन्म और मृत्यु के बंधनों से मुक्ति के लिए और रोग, शोक, भय आदि का नाश करने के लिए यह विधि अत्यंत प्रभावी है।

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