श्री पार्शवनाथ चालीसा PDF हिन्दी
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श्री पार्शवनाथ चालीसा हिन्दी Lyrics
श्री पार्शवनाथ चालीसा एक भक्तिपूर्ण स्तोत्र है जो जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर, भगवान पार्शवनाथ को समर्पित है। यह चालीस चौपाइयों का संग्रह है जो भगवान की महिमा, गुणों और शिक्षाओं का वर्णन करता है। चालीसा का पाठ करने से भक्तों को आध्यात्मिक शांति, मानसिक स्थिरता और जीवन में आने वाली बाधाओं से मुक्ति मिलती है। यह माना जाता है कि नियमित पाठ से भय, दुख और संकट दूर होते हैं और भगवान पार्शवनाथ की कृपा प्राप्त होती है। चालीसा जैन अनुयायियों के बीच बहुत लोकप्रिय है और इसका पाठ व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों रूप से किया जाता है।
श्री पार्शवनाथ जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर थे और उन्हें एक महान जैन गुरु के रूप में पूजा जाता है। उनका जन्म वाराणसी में इक्ष्वाकु वंश में हुआ था। उन्होंने सांसारिक सुखों का त्याग कर कठोर तपस्या की और ‘केवल ज्ञान’ प्राप्त किया। उन्होंने अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना) और अपरिग्रह (अनावश्यक संग्रह न करना) के चार मुख्य सिद्धांत दिए, जिन्हें ‘चतुर्याम धर्म’ कहा जाता है। उन्होंने अपने शिष्यों को मोक्ष का मार्ग दिखाया और उनके उपदेशों ने लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित किया। उनके अनुयायियों में जैन मुनि और श्रावक दोनों शामिल थे, जिन्होंने उनकी शिक्षाओं का पालन किया और उन्हें आगे बढ़ाया। पार्शवनाथ को उनके धैर्य, करुणा और आध्यात्मिक शक्ति के लिए सम्मानित किया जाता है।
|| श्री पार्शवनाथ चालीसा (Parasnath Chalisa PDF) ||
|| दोहा ||
शीश नवा अरिहंत को,
सिद्धन करुं प्रणाम |
उपाध्याय आचार्य का
ले सुखकारी नाम |
सर्व साधु और सरस्वती,
जिन मन्दिर सुखकार |
अहिच्छत्र और पार्श्व को,
मन मन्दिर में धार ||
|| चौपाई ||
पार्श्वनाथ जगत हितकारी,
हो स्वामी तुम व्रत के धारी |
सुर नर असुर करें तुम सेवा,
तुम ही सब देवन के देवा |
तुमसे करम शत्रु भी हारा,
तुम कीना जग का निस्तारा |
अश्वसैन के राजदुलारे,
वामा की आँखो के तारे |
काशी जी के स्वामी कहाये,
सारी परजा मौज उड़ाये |
इक दिन सब मित्रों को लेके,
सैर करन को वन में पहुँचे |
हाथी पर कसकर अम्बारी,
इक जगंल में गई सवारी |
एक तपस्वी देख वहां पर,
उससे बोले वचन सुनाकर |
तपसी! तुम क्यों पाप कमाते,
इस लक्कड़ में जीव जलाते |
तपसी तभी कुदाल उठाया,
उस लक्कड़ को चीर गिराया |
निकले नाग-नागनी कारे,
मरने के थे निकट बिचारे |
रहम प्रभू के दिल में आया,
तभी मन्त्र नवकार सुनाया |
भर कर वो पाताल सिधाये,
पद्मावति धरणेन्द्र कहाये |
तपसी मर कर देव कहाया,
नाम कमठ ग्रन्थों में गाया |
एक समय श्रीपारस स्वामी,
राज छोड़ कर वन की ठानी |
तप करते थे ध्यान लगाये,
इकदिन कमठ वहां पर आये |
फौरन ; ही प्रभु को पहिचाना,
बदला लेना दिल में ठाना |
बहुत अधिक बारिश बरसाई,
बादल गरजे बिजली गिराई |
बहुत अधिक पत्थर बरसाये,
स्वामी तन को नहीं हिलाये |
पद्मावती धरणेन्द्र भी आए,
प्रभु की सेवा मे चित लाए |
धरणेन्द्र ने फन फैलाया,
प्रभु के सिर पर छत्र बनाया |
पद्मावति ने फन फैलाया,
उस पर स्वामी को बैठाया |
कर्मनाश प्रभु ज्ञान उपाया,
समोशरण देवेन्द्र रचाया |
यही जगह अहिच्छत्र कहाये,
पात्र केशरी जहां पर आये |
शिष्य पाँच सौ संग विद्वाना,
जिनको जाने सकल जहाना |
पार्श्वनाथ का दर्शन पाया
सबने जैन धरम अपनाया |
अहिच्छत्र श्री सुन्दर नगरी,
जहाँ सुखी थी परजा सगरी |
राजा श्री वसुपाल कहाये,
वो इक जिन मन्दिर बनवाये |
प्रतिमा पर पालिश करवाया,
फौरन इक मिस्त्री बुलवाया |
वह मिस्तरी मांस था खाता,
इससे पालिश था गिर जाता |
मुनि ने उसे उपाय बताया,
पारस दर्शन व्रत दिलवाया |
मिस्त्री ने व्रत पालन कीना,
फौरन ही रंग चढ़ा नवीना |
गदर सतावन का किस्सा है,
इक माली का यों लिक्खा है |
वह माली प्रतिमा को लेकर,
झट छुप गया कुए के अन्दर |
उस पानी का अतिशय भारी,
दूर होय सारी बीमारी |
जो अहिच्छत्र ह्रदय से ध्वावे,
सो नर उत्तम पदवी वावे |
पुत्र संपदा की बढ़ती हो,
पापों की इक दम घटती हो |
है तहसील आंवला भारी,
स्टेशन पर मिले सवारी |
रामनगर इक ग्राम बराबर,
जिसको जाने सब नारी नर |
चालीसे को ‘चन्द्र’ बनाये,
हाथ जोड़कर शीश नवाये |
|| सोरठा ||
नित चालीसहिं बार,
पाठ करे चालीस दिन |
खेय सुगन्ध अपार,
अहिच्छत्र में आय के |
होय कुबेर समान,
जन्म दरिद्री होय जो |
जिसके नहिं सन्तान,
नाम वंश जग में चले ||
|| श्री पार्शवनाथ चालीसा विधि ||
- प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद, स्वच्छ वस्त्र पहनकर श्री पारसनाथ भगवान की प्रतिमा या चित्र के सामने बैठकर चालीसा का पाठ करें।
- पाठ करते समय मन और शरीर की शुद्धता का विशेष ध्यान रखें।
- पाठ से पहले भगवान को पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
- पाठ शुरू करने से पहले अपनी मनोकामना का संकल्प लें।
|| श्री पार्शवनाथ चालीसा लाभ ||
- चालीसा का पाठ करने से मन को शांति मिलती है और मानसिक तनाव दूर होता है।
- यह चालीसा आर्थिक संकटों को दूर करने में सहायक है और धन-धान्य की वृद्धि होती है।
- रोगों से मुक्ति के लिए यह चालीसा अत्यंत लाभकारी है।
- कुंडली में ग्रहों की अशुभता को शांत करने के लिए यह चालीसा बहुत प्रभावी है।
- चालीसा का नियमित पाठ करने से आत्मिक उन्नति होती है और व्यक्ति मोक्ष की ओर अग्रसर होता है।
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