भारत में आप चाहे किसी भी शहर में चले जाएं, एक चीज़ आपको हर जगह देखने को मिलेगी – दुकानों के शटर पर, नई चमचमाती कारों के बंपर पर, और घरों के मुख्य दरवाज़े पर लटका हुआ नींबू और 7 हरी मिर्च।
हम अक्सर इसे “बुरी नज़र” (Evil Eye) से बचने का ‘टोटका’ मानते हैं। लोग कहते हैं, “इसे लगा लो, धंधे को नज़र नहीं लगेगी।” लेकिन क्या यह सिर्फ डर और अंधविश्वास (Superstition) है, या हमारे पूर्वजों ने इसके पीछे भी कोई तगड़ा साइंस (Science) छिपा रखा था? आज हम इस “देसी सुरक्षा कवच” के राज़ से पर्दा उठाएंगे और जानेंगे कि आखिर नींबू-मिर्च का असली लॉजिक क्या है।
पौराणिक कथा – देवी लक्ष्मी और उनकी बहन का किस्सा (The Mythological Story)
हमारे धर्म और पुराणों में हर परंपरा के पीछे एक कहानी होती है। नींबू-मिर्च लटकाने का संबंध धन की देवी महालक्ष्मी और उनकी बड़ी बहन अलक्ष्मी (Alakshmi) से है।
- अलक्ष्मी कौन हैं? जहाँ माँ लक्ष्मी धन और समृद्धि (Prosperity) लाती हैं, वहीं अलक्ष्मी को दरिद्रता (Poverty) और बदकिस्मती की देवी माना जाता है।
- पसंद का खेल- मान्यता है कि माँ लक्ष्मी को मीठा पसंद है, इसलिए हम त्योहारों पर मिठाई घर के अंदर रखते हैं। लेकिन अलक्ष्मी को खट्टा (Sour) और तीखा (Spicy) बहुत पसंद है।
लॉजिक – लोग घर या दुकान के बाहर नींबू-मिर्च इसलिए टांगते हैं ताकि जब अलक्ष्मी आएं, तो वे बाहर ही अपनी मनपसंद चीज़ (नींबू-मिर्च) खाकर तृप्त (Satisfied) हो जाएं और घर के अंदर प्रवेश न करें। यानी, मुसीबत को दरवाज़े से ही ‘टाटा-बाय-बाय’ कर दिया जाए!
नींबू-मिर्च पीछे का असली साइंस
अब जरा चश्मा बदलकर इसे विज्ञान (Science) और पुराने जमाने के लाइफस्टाइल (Lifestyle) के नज़रिए से देखते हैं। जब कीटनाशक (Pesticides) नहीं थे, तब यह साधारण सा दिखने वाला टोटका बहुत काम का था।
प्राकृतिक कीटनाशक (Natural Insect Repellent)
पुराने समय में घर मिट्टी और गारे के बने होते थे, और दुकानें भी खुली होती थीं। मच्छर, मक्खियां और छोटे कीड़े-मकौड़े बहुत आते थे।
- नींबू में सिट्रिक एसिड (Citric Acid) होता है और मिर्च में तीखापन। जब इन्हें एक सूती धागे (Cotton Thread) में पिरोया जाता है, तो एक दिलचस्प रासायनिक प्रक्रिया (Chemical Process) होती है।
- धागा नींबू और मिर्च के रस को सोख (Absorb) लेता है और हवा में धीरे-धीरे एक विशेष गंध (Smell) छोड़ता है। यह गंध कीड़ों को अंदर आने से रोकती है। यह उस जमाने का ‘ऑल-आउट’ या ‘एयर फ्रेशनर’ था!
हवा की शुद्धता (Air Purification)
वैज्ञानिक रूप से देखें तो नींबू और मिर्च दोनों में विटामिन सी (Vitamin C) और एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं। जब हवा इस धागे से होकर गुजरती है, तो यह हवा में मौजूद कुछ कीटाणुओं को मारने में मदद करता था, जिससे घर का माहौल स्वस्थ (Healthy) रहता था।
सफर में सुरक्षा (Travel Safety)
पुराने समय में लोग बैलगाड़ियों या पैदल लंबा सफर तय करते थे।
- जंगलों के रास्ते में सांप या कीड़े के काटने का डर रहता था। मिर्च का इस्तेमाल यह जांचने के लिए किया जाता था कि सांप जहरीला है या नहीं (अगर जीभ पर मिर्च का स्वाद न आए, तो मतलब जहर फैल चुका है – ऐसा माना जाता था)।
- वहीं, नींबू पानी की कमी (Dehydration) दूर करने के काम आता था। इसलिए लोग इसे हमेशा अपनी गाड़ी या पोटली में साथ रखते थे, जो धीरे-धीरे एक रिवाज बन गया।
मनोवैज्ञानिक असर (Psychological Effect)
विज्ञान से परे, इसका एक मनोवैज्ञानिक पहलू (Psychological Aspect) भी है। जब हम किसी नई चीज़ (जैसे नई कार या दुकान) को देखते हैं, तो हमारी नज़र उस पर टिक जाती है। लेकिन अगर वहां नींबू-मिर्च लटका हो, तो हमारी नज़र उस अटपटी चीज़ पर जाकर भंग (Distract) हो जाती है।
माना जाता है कि इससे देखने वाले की एकाग्रता (Concentration) टूटती है और उसकी “बुरी नज़र” का प्रभाव (Impact) उस कीमती चीज़ पर नहीं पड़ता। यह एक तरह का ‘विजुअल डिस्ट्रैक्शन’ (Visual Distraction) है।
तो क्या हमें नींबू-मिर्च अब भी मानना चाहिए?
आज हमारे पास कीड़े भगाने के लिए स्प्रे हैं और डिहाइड्रेशन के लिए मिनरल वाटर। लेकिन, नींबू-मिर्च की यह परंपरा भारतीय संस्कृति (Culture) का एक रंग-बिरंगा हिस्सा बन चुकी है।
अगर इसे टांगने से किसी को मन की शांति (Peace of Mind) मिलती है और उसे लगता है कि उसकी मेहनत सुरक्षित है, तो इसमें कोई बुराई नहीं है। बस याद रखें, असली तरक्की नींबू-मिर्च से नहीं, आपकी कड़ी मेहनत (Hard Work) से आती है। नींबू-मिर्च तो बस एक ‘विश्वास का साथी’ है।
तो अगली बार जब आप किसी ट्रक के पीछे झूलता हुआ नींबू-मिर्च देखें, तो मुस्कुराइएगा – क्योंकि अब आप जानते हैं कि यह सिर्फ टोटका नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों का एक स्मार्ट “देसी जुगाड़” था!
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