भगवान नृसिंह, श्री हरि विष्णु के चौथे और सबसे उग्र अवतार माने जाते हैं। नृसिंह द्वादशी का व्रत भक्तों की रक्षा और संकटों के नाश के लिए किया जाता है। यहाँ प्रस्तुत है इस व्रत की पूर्ण और पारंपरिक कथा।
|| भगवान नृसिंह द्वादशी व्रत कथा (Narsimha Dwadashi Vrat Katha PDF) ||
प्राचीन काल में कश्यप ऋषि के दो पुत्र थे – हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप। जब भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष का वध कर दिया, तो उसका भाई हिरण्यकश्यप प्रतिशोध की आग में जलने लगा। उसने भगवान विष्णु को अपना शत्रु मान लिया और अमर होने के लिए कठोर तपस्या शुरू की।
हिरण्यकश्यप की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी प्रकट हुए। हिरण्यकश्यप ने उनसे अमरता का वरदान माँगा। ब्रह्मा जी ने कहा, “सृष्टि के नियम के अनुसार जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है। तुम कोई अन्य वर मांग लो।”
तब हिरण्यकश्यप ने बहुत सोच-समझकर वरदान माँगा: “हे प्रभु! न मुझे कोई मनुष्य मार सके, न पशु। न मैं दिन में मरूँ, न रात में। न घर के भीतर मरूँ, न बाहर। न किसी अस्त्र से मरूँ, न शस्त्र से। न पृथ्वी पर मरूँ, न आकाश में।” ब्रह्मा जी ने ‘तथास्तु’ कहकर उसे यह वरदान दे दिया।
वरदान पाकर हिरण्यकश्यप निरंकुश हो गया। उसने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया और आदेश दिया कि सभी केवल उसी की पूजा करें। विष्णु का नाम लेने वाले को मृत्युदंड दिया जाने लगा।
इसी दौरान, हिरण्यकश्यप के घर एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम प्रह्लाद रखा गया। दैत्य कुल में जन्म लेने के बाद भी प्रह्लाद बाल्यावस्था से ही भगवान विष्णु के परम भक्त थे। वे दिन-रात “श्री हरि, श्री हरि” का जाप करते थे।
जब हिरण्यकश्यप को पता चला कि उसका अपना पुत्र उसके शत्रु (विष्णु) की भक्ति करता है, तो उसने प्रह्लाद को बहुत समझाया, लेकिन प्रह्लाद नहीं माने। क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को मारने के कई प्रयास किए – उन्हें ऊँचे पहाड़ से नीचे फेंका गया, पर भगवान ने बचा लिया। हाथियों के पैरों तले कुचलवाने की कोशिश की गई। जहरीले साँपों के बीच छोड़ा गया। होलिका की गोद में आग में बैठाया गया (जहाँ होलिका जल गई, पर प्रह्लाद सुरक्षित रहे)।
हर बार भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बाल-बाल बच गए और उनकी भक्ति और दृढ़ होती गई।
अंत में, क्रोध से पागल होकर हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को राजसभा में बुलाया और कड़ककर पूछा, “मूर्ख! तू किसके बलबूते पर मेरी आज्ञा नहीं मानता? कहाँ है तेरा वो भगवान?” प्रह्लाद ने विनम्रता से उत्तर दिया, “पिताजी, वे कण-कण में व्याप्त हैं। वे मुझमें हैं, आपमें हैं और इस खंभे में भी हैं।”
यह सुनकर हिरण्यकश्यप ने अपनी गदा उठाई और उस खंभे पर दे मारी। “अगर तेरा भगवान इस खंभे में है, तो वह मेरी गदा से तुझे बचाने क्यों नहीं आता?”
तभी एक भयानक गर्जना हुई और खंभा फट गया। उसमें से भगवान नृसिंह प्रकट हुए। उनका रूप अत्यंत विकराल था – आधा शरीर मनुष्य का और मुख सिंह का। उनकी आँखें अंगारे जैसी लाल थीं।
हिरण्यकश्यप ने नृसिंह भगवान पर आक्रमण किया, लेकिन भगवान ने उसे पकड़ लिया।
ब्रह्मा जी के वरदान का मान रखते हुए भगवान नृसिंह ने हिरण्यकश्यप का वध इस प्रकार किया – समय न दिन था, न रात (संध्या काल/गोधूलि बेला)। स्थान न घर के अंदर, न बाहर (चौखट/देहरी पर)। स्थिति न पृथ्वी पर, न आकाश में (अपनी जांघों/गोद पर रखा)। हत्यारा न नर, न पशु (नृसिंह अवतार)। हथियार न अस्त्र, न शस्त्र (अपने तीखे नाखूनों से उसका सीना चीर दिया)।
इस प्रकार भगवान नृसिंह ने हिरण्यकश्यप का वध कर अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की और धर्म की स्थापना की।
व्रत का महत्त्व और फल
नृसिंह द्वादशी के दिन जो भक्त श्रद्धापूर्वक उपवास रखते हैं और भगवान नृसिंह की कथा सुनते हैं, उन्हें:
- शत्रुओं से मुक्ति मिलती है।
- कोर्ट-कचहरी और मुकदमों में विजय प्राप्त होती है।
- सभी प्रकार के भय और संकट दूर होते हैं।
- भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
|| नृसिंह मंत्र ||
पूजा के समय इस महामंत्र का जाप अवश्य करें:
- ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्।
- नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥
अर्थ – मैं उस नृसिंह भगवान को नमन करता हूँ जो उग्र और वीर हैं, जो महाविष्णु हैं, जो चारों दिशाओं में जल रहे हैं, जिनका मुख सर्वत्र है, जो भीषण होते हुए भी भद्र (कल्याणकारी) हैं और जो मृत्यु की भी मृत्यु हैं।
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