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पुथन्डू की पौराणिक कथा

Puthandu Ki Pauraanik Katha Hindi

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पुथन्डू (Puthandu), जिसे तमिल नव वर्ष भी कहा जाता है, तमिल कैलेंडर के पहले महीने ‘चित्तिरै’ (Chithirai) के पहले दिन मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस दिन का संबंध सृष्टि की रचना और समय के चक्र से है। यहाँ पुथन्डू की पौराणिक कथा और इसका महत्व विस्तार से दिया गया है:

|| पुथन्डू की पौराणिक कथा ||

ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि की रचना

पुथन्डू से जुड़ी सबसे प्रमुख कथा भगवान ब्रह्मा से संबंधित है। मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान ब्रह्मा ने ब्रह्मांड की रचना शुरू की थी। उन्होंने समय की गणना, ऋतुओं के चक्र और संसार के कार्यों का शुभारंभ इसी तिथि से किया था। इसलिए, इसे ‘नव वर्ष’ के रूप में नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है।

इंद्र देव का आगमन

एक अन्य लोक कथा के अनुसार, पुथन्डू के दिन देवराज इंद्र पृथ्वी पर शांति और समृद्धि सुनिश्चित करने के लिए आते हैं। भक्त इस दिन उनकी पूजा करते हैं ताकि पूरे वर्ष वर्षा अच्छी हो और फसलें लहलहाती रहें।

|| पुथन्डू का ‘कन्नी’ (दर्शन) ||

पुथन्डू की सुबह एक विशेष परंपरा निभाई जाती है जिसे ‘कन्नी’ (Kanni) कहते हैं। लोग मानते हैं कि नए साल की सुबह सबसे पहले जो चीजें देखी जाती हैं, वही पूरे साल के भाग्य का निर्धारण करती हैं।

  • तैयारी – साल की पूर्व संध्या पर एक थाली में सोना, चांदी, गहने, फल (आम, केला, कटहल), फूल, सुपारी और एक दर्पण सजाया जाता है।
  • महत्व – सुबह उठकर सबसे पहले दर्पण में इन शुभ वस्तुओं के दर्शन किए जाते हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि व्यक्ति का आने वाला वर्ष धन, धान्य और खुशियों से भरा रहेगा।

|| पुथन्डू का मुख्य संदेश – ‘मंगा पचड़ी’ ||

इस दिन एक विशेष व्यंजन बनाया जाता है जिसे ‘मंगा पचड़ी’ (Mangai Pachadi) कहते हैं। इसमें छह अलग-अलग स्वाद होते हैं, जो जीवन के विभिन्न अनुभवों को दर्शाते हैं:

  • मीठा – गुड़ – खुशी और उल्लास |
  • कड़वा – नीम के फूल – दुख और चुनौतियां |
  • खट्टा – इमली – खट्टे अनुभव या चपलता |
  • तीखा – लाल मिर्च – क्रोध या जोश |
  • नमकीन – नमक – डर या जीवन का सार |
  • कसैला – कच्चा आम – विस्मय या आश्चर्य |

कथा का सार – यह व्यंजन हमें सिखाता है कि नया साल हमारे लिए सुख और दुख दोनों लेकर आएगा, और हमें दोनों को समान भाव से स्वीकार करना चाहिए।

|| उत्सव की विधि ||

  • लोग अपने घरों के बाहर ‘कोलम’ (रंगोली) बनाते हैं।
  • नए कपड़े पहने जाते हैं और मंदिरों में विशेष प्रार्थनाएं की जाती हैं।
  • पंचांग (तमिल कैलेंडर) का पाठ किया जाता है ताकि साल भर के शुभ-अशुभ समय का ज्ञान हो सके।

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