गुड़ी पड़वा केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि विजय, सृजन और नई शुरुआत का प्रतीक है। हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाने वाला यह पर्व कई गहरी कथाओं और मान्यताओं को अपने भीतर समेटे हुए है।
|| गुड़ी पड़वा की पौराणिक कथा ||
ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि की रचना
सबसे प्राचीन मान्यता के अनुसार, इसी दिन ब्रह्मांड के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि का निर्माण कार्य आरंभ किया था। माना जाता है कि सतयुग का प्रारंभ इसी तिथि से हुआ था। ब्रह्मा जी ने समय चक्र को गति दी, वार, मास और वर्षों का निर्धारण किया।
शास्त्रों के अनुसार, चैत्र प्रतिपदा के सूर्योदय पर ब्रह्मा जी ने समस्त चराचर जगत को चैतन्य किया था। इसीलिए गुड़ी पड़वा को ‘नव संवत्सर’ (नए साल) के रूप में मनाया जाता है।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की विजयगाथा
त्रेतायुग की एक अत्यंत लोकप्रिय कथा भगवान श्री राम से जुड़ी है। दक्षिण भारत (विशेषकर किष्किंधा) में वानर राज बाली का भारी आतंक था। भगवान श्री राम ने इसी दिन बाली के कुशासन से प्रजा को मुक्ति दिलाई थी।
बाली के वध के बाद जब प्रजा ने भयमुक्त होकर सांस ली, तो उन्होंने अपने घरों के बाहर विजय के प्रतीक के रूप में ‘ध्वज’ (गुड़ी) फहराया। यही कारण है कि आज भी ऊँची गुड़ी फहराकर विजय का उत्सव मनाया जाता है।
कुछ क्षेत्रों में यह भी मान्यता है कि रावण वध के पश्चात जब प्रभु राम अयोध्या लौटे, तब उनका राज्याभिषेक इसी समय के आसपास हुआ था और पूरे नगर में खुशियाँ मनाई गई थीं।
शालिवाहन और मिट्टी की सेना
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से सम्राट शालिवाहन की कथा अत्यंत प्रेरणादायी है, जिन्होंने ‘शालिवाहन शक’ की शुरुआत की।
कहा जाता है कि शालिवाहन के पास शत्रुओं (शकों) से लड़ने के लिए सेना नहीं थी। तब उन्होंने मिट्टी के सैनिकों की मूर्तियाँ बनाईं और उनमें प्राण फूँक दिए।
इस चमत्कारिक सेना की सहायता से उन्होंने अपने शक्तिशाली शत्रुओं को परास्त किया। इस महान विजय की याद में ‘शक संवत’ प्रारंभ हुआ और लोगों ने अपने घरों पर गुड़ी लगाकर अपनी स्वतंत्रता का जश्न मनाया।
|| गुड़ी (विजय ध्वज) का स्वरूप और महत्व ||
गुड़ी बनाना केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि इसके हर घटक का अपना एक अर्थ है:
- बांस की लकड़ी – मजबूती और आधार का प्रतीक।
- उल्टा तांबे/चांदी का कलश – विजय और यश का कलश।
- रेशमी वस्त्र (साड़ी) – समृद्धि और वैभव का सूचक।
- नीम की पत्तियां – आरोग्य और कड़वाहट को सोखने की शक्ति।
- शक्कर की माला (गाठी) – जीवन की मधुरता का प्रतीक।
गुड़ी पड़वा के दिन नीम और गुड़ का मिश्रण खाने की परंपरा है। यह हमें सिखाता है कि आने वाला वर्ष सुख (गुड़) और दुख (नीम) दोनों का मिश्रण होगा, और हमें दोनों को समान भाव से स्वीकार करना चाहिए।
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