गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती हिंदू कैलेंडर के अनुसार प्रतिवर्ष श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को मनाई जाती है। वर्ष 2026 में, तुलसीदास जयंती 19 अगस्त, बुधवार को मनाई जाएगी।
महाकवि तुलसीदास जी को भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त और कालजयी ग्रंथ ‘रामचरितमानस’ के रचयिता के रूप में पूजा जाता है। उन्होंने संस्कृत के कठिन ज्ञान को जन-सामान्य की भाषा (अवधी) में प्रस्तुत कर भक्ति मार्ग को सरल बनाया। इस दिन भक्त मंदिरों में भजन-कीर्तन करते हैं और रामचरितमानस का पाठ करते हैं। उनकी रचनाएँ आज भी समाज को नैतिकता और मर्यादा का पाठ पढ़ाती हैं।
प्रत्येक वर्ष श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को भारतवर्ष में ‘तुलसीदास जयंती’ बड़े ही श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ मनाई जाती है। यह पावन अवसर हमें भक्तिकाल के उस महान कवि, संत और दार्शनिक की याद दिलाता है, जिन्होंने अपनी लेखनी से न केवल समाज को धर्म, नैतिकता और आदर्शों का पाठ पढ़ाया, बल्कि भारतीय साहित्य को भी एक अमूल्य धरोहर प्रदान की।
Tulsidas Jayanti 2026 – गोस्वामी तुलसीदास जीवन परिचय
गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म 1532 ईस्वी (संभवतः) में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के राजापुर गाँव में हुआ था। उनके बचपन का नाम रामबोला था। ऐसा कहा जाता है कि जन्म के समय ही उनके मुख से ‘राम’ नाम निकला था, जिससे उनका यह नाम पड़ा। उनके जन्म के कुछ ही समय बाद उनकी माता का निधन हो गया और पिता ने उन्हें त्याग दिया। उनका शुरुआती जीवन अत्यंत कठिनाइयों और संघर्षों से भरा रहा। उन्हें एक संत नरहरिदास जी ने अपनाया और शिक्षा-दीक्षा दी।
तुलसीदास जी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा काशी में शेष सनातन जी के सान्निध्य में प्राप्त की, जहाँ उन्होंने वेद, वेदांग, दर्शन, इतिहास, पुराण और संस्कृत व्याकरण का गहन अध्ययन किया। उनका विवाह रत्नावली से हुआ था, जिनसे उन्हें अत्यंत प्रेम था। एक घटना के अनुसार, रत्नावली द्वारा कही गई कुछ कटु बातें उनके जीवन में एक बड़ा मोड़ साबित हुईं। रत्नावली ने उन्हें संसार की मोह-माया से ऊपर उठकर प्रभु श्री राम की भक्ति में लीन होने की प्रेरणा दी। इस घटना के बाद तुलसीदास जी ने गृह त्याग कर अपना जीवन पूर्णतः रामभक्ति को समर्पित कर दिया।
गोस्वामी तुलसीदास काव्य साधना – भक्ति और साहित्य का संगम
तुलसीदास जी का काव्य उनकी गहन भक्ति, लोक कल्याण की भावना और अद्भुत साहित्यिक प्रतिभा का परिचायक है। उन्होंने विभिन्न विधाओं में रचनाएँ कीं, जिनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं:
- रामचरितमानस – यह तुलसीदास जी की सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण कृति है। अवधी भाषा में रचित यह महाकाव्य भगवान श्री राम के संपूर्ण जीवन चरित्र का अनुपम वर्णन करता है। रामचरितमानस न केवल एक धार्मिक ग्रंथ है, बल्कि यह मानवीय मूल्यों, आदर्शों, पारिवारिक संबंधों, सामाजिक मर्यादाओं और नीति-ज्ञान का भी एक वृहद संग्रह है। इसकी प्रत्येक चौपाई, प्रत्येक दोहा हमें जीवन जीने की कला सिखाता है। यह भारत के घर-घर में पढ़ा जाने वाला और सर्वाधिक पूजनीय ग्रंथ है।
- विनय पत्रिका – ब्रजभाषा में रचित यह ग्रंथ विभिन्न देवी-देवताओं और विशेष रूप से भगवान राम की स्तुति में लिखे गए पदों का संग्रह है। इसमें तुलसीदास जी की दैन्य भाव, आत्मनिवेदन और शरणागति की भावना स्पष्ट परिलक्षित होती है।
- कवितावली – यह ब्रजभाषा में रचित कविताओं का संग्रह है, जिसमें रामकथा के विभिन्न प्रसंगों का सजीव चित्रण किया गया है।
- गीतावली – यह भी ब्रजभाषा में रचित पदों का संग्रह है, जिसमें भगवान राम के बाल-रूप और विभिन्न लीलाओं का भावपूर्ण वर्णन है।
- दोहावली – इसमें नीति, भक्ति और ज्ञान से संबंधित दोहों का संग्रह है।
- बरवै रामायण, रामाज्ञा प्रश्न, पार्वती मंगल, जानकी मंगल, वैराग्य संदीपनी, कृष्ण गीतावली आदि भी उनकी अन्य महत्वपूर्ण रचनाएँ हैं।
- तुलसीदास जी ने अपने काव्य में लोकभाषाओं (अवधी और ब्रज) का प्रयोग कर जनसामान्य तक अपनी बात पहुँचाई। उनकी भाषा सरल, सुबोध और प्रभावोत्पादक है। उन्होंने छंदों और अलंकारों का प्रयोग अत्यंत कुशलता से किया, जिससे उनका काव्य और भी अधिक मनोहारी बन गया।
रामभक्ति का महत्व – जन-जन के आराध्य
तुलसीदास जी की रामभक्ति अनन्य और अतुलनीय थी। उन्होंने भगवान श्री राम को मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में चित्रित किया, जो आदर्श पुत्र, आदर्श पति, आदर्श भाई, आदर्श मित्र और आदर्श राजा थे। तुलसीदास जी की भक्ति केवल व्यक्तिगत मोक्ष तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे राम के आदर्शों के माध्यम से समाज में धर्म, न्याय और नैतिकता की स्थापना करना चाहते थे।
उनकी रामभक्ति ने जनमानस को अज्ञानता और कुरीतियों से मुक्ति दिलाने का कार्य किया। रामचरितमानस ने समाज के हर वर्ग को राम से जोड़ा। शूद्रों और स्त्रियों को भी भक्ति का मार्ग प्रशस्त हुआ, जो उस समय के समाज में एक क्रांतिकारी कदम था। तुलसीदास जी ने रामकथा को एक ऐसे सरल और सुलभ माध्यम से प्रस्तुत किया कि वह हर व्यक्ति के हृदय में उतर गई।
तुलसीदास जी ने भगवान राम के सगुण रूप की उपासना की, लेकिन उनके काव्य में निर्गुण ब्रह्म की अवधारणा भी निहित है। उन्होंने दिखाया कि राम केवल एक राजा नहीं, बल्कि परब्रह्म परमेश्वर के अवतार हैं, जो धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुए।
तुलसीदास जी का निधन 1623 ईस्वी में हुआ, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है और प्रासंगिक है। उनके द्वारा रचित रामचरितमानस आज भी करोड़ों लोगों के जीवन का आधार है। यह हमें सिखाता है कि सत्य, धर्म, त्याग और प्रेम ही जीवन के वास्तविक मूल्य हैं।
तुलसीदास जयंती का यह अवसर हमें याद दिलाता है कि कैसे एक व्यक्ति अपनी भक्ति, समर्पण और काव्य प्रतिभा से समाज को एक नई दिशा दे सकता है। उनकी रचनाएँ हमें संकटों में धैर्य रखना, विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म का पालन करना और दूसरों के प्रति प्रेम और करुणा का भाव रखना सिखाती हैं।
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