युगादि (Ugadi), जिसे संवत्सर पाडवो भी कहा जाता है, हिंदू नववर्ष का प्रतीक है। यह पर्व मुख्य रूप से कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में मनाया जाता है। “युगादि” शब्द संस्कृत के दो शब्दों से बना है: युग (काल/समय) और आदि (शुरुआत)।
यहाँ युगादि की पौराणिक कथा और इसका आध्यात्मिक महत्व विस्तार से दिया गया है – युगादि से जुड़ी सबसे प्रमुख पौराणिक कथा भगवान ब्रह्मा से संबंधित है। माना जाता है कि इसी दिन भगवान ब्रह्मा ने ब्रह्मांड की रचना शुरू की थी।
सतयुग के आरंभ में, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को ब्रह्मा जी ने समय की गणना शुरू की और ग्रहों, नक्षत्रों, ऋतुओं तथा समस्त जीव-जगत को अस्तित्व में लाए। मत्स्य पुराण के अनुसार, इसी दिन से ‘काल’ का पहिया घूमना शुरू हुआ था। इसलिए इसे “सृष्टि का जन्मदिन” भी माना जाता है।
भगवान विष्णु और सोमकासुर की कथा
एक अन्य प्रचलित कथा हयग्रीव अवतार से जुड़ी है – असुर सोमकासुर ने ब्रह्मा जी से वेदों को चुरा लिया था और उन्हें समुद्र की गहराइयों में छिपा दिया था। वेदों के बिना ज्ञान का लोप हो गया और सृष्टि में अंधकार छाने लगा। भगवान विष्णु ने मत्स्य (मछली) का अवतार धारण किया और सोमकासुर का वध करके वेदों को पुनः प्राप्त किया।
जिस दिन भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी को वेद वापस सौंपे और ज्ञान की पुनर्स्थापना हुई, वह दिन युगादि कहलाया। यह दिन बुराई पर अच्छाई और अज्ञान पर ज्ञान की जीत का प्रतीक है।
भगवान श्री राम का राज्याभिषेक
त्रेतायुग में, इसी दिन भगवान श्री राम ने रावण का वध कर लंका पर विजय प्राप्त करने के पश्चात अयोध्या वापसी की थी। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही उनका राज्याभिषेक हुआ था, जिससे एक धर्म-परायण राज्य (रामराज्य) की नींव पड़ी।
युगादि का सांस्कृतिक महत्व – ‘युगादि पचड़ी’
युगादि के दिन एक विशेष व्यंजन बनाया जाता है जिसे ‘पचड़ी’ कहते हैं। यह कथा और परंपरा का एक अभिन्न अंग है जो जीवन के दर्शन को समझाता है।
- मीठा गुड़/केला – खुशी और आनंद
- खट्टा इमली – चुनौतियाँ और धैर्य
- कड़वा नीम के फूल – दुख और कठिन समय
- तीखा काली मिर्च – क्रोध और उत्तेजना
- नमकीन नमक – उत्साह और रुचि
- कसैला कच्चा आम – विस्मय और नयापन
शिक्षा – युगादि की कथा हमें सिखाती है कि नया वर्ष हमारे लिए सुख और दुख दोनों लेकर आएगा, और हमें दोनों को समान भाव से स्वीकार करना चाहिए।
|| युगादि मनाने की विधि ||
- तैल स्नान – इस दिन सुबह जल्दी उठकर शरीर पर तिल का तेल लगाकर स्नान करने का महत्व है।
- पंचांग श्रवणम – लोग मंदिरों या घरों में एकत्रित होकर नए वर्ष का ‘पंचांग’ सुनते हैं, जिसमें आने वाले वर्ष के भविष्यफल की चर्चा होती है।
- तोरण – द्वारों पर आम के पत्तों और ताजे फूलों के तोरण लगाए जाते हैं, जो समृद्धि का प्रतीक हैं।
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