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शीश गंग अर्धंग पार्वती

Sheesh Gang Ardhang Bhajan Hindi Lyrics

Misc ✦ Bhajan (भजन संग्रह) ✦ हिन्दी
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|| शीश गंग अर्धंग पार्वती ||

शीश गंग अर्धंग पार्वती,

सदा विराजत कैलासी ।

नंदी भृंगी नृत्य करत हैं,

धरत ध्यान सुर सुखरासी ॥

शीतल मन्द सुगन्ध पवन,

बह बैठे हैं शिव अविनाशी ।

करत गान-गन्धर्व सप्त स्वर,

राग रागिनी मधुरासी ॥

यक्ष-रक्ष-भैरव जहँ डोलत,

बोलत हैं वनके वासी ।

कोयल शब्द सुनावत सुन्दर,

भ्रमर करत हैं गुंजा-सी ॥

कल्पद्रुम अरु पारिजात तरु,

लाग रहे हैं लक्षासी ।

कामधेनु कोटिन जहँ डोलत,

करत दुग्ध की वर्षा-सी ॥

सूर्यकान्त सम पर्वत शोभित,

चन्द्रकान्त सम हिमराशी ।

नित्य छहों ऋतु रहत सुशोभित,

सेवत सदा प्रकृति दासी ॥

ऋषि मुनि देव दनुज नित सेवत,

गान करत श्रुति गुणराशी ।

ब्रह्मा, विष्णु निहारत निसिदिन,

कछु शिव हमकूँ फरमासी ॥

ऋद्धि-सिद्धि के दाता शंकर,

नित सत् चित् आनन्दराशी ।

जिनके सुमिरत ही कट जाती,

कठिन काल यमकी फांसी ॥

त्रिशूलधरजी का नाम निरन्तर,

प्रेम सहित जो नर गासी ।

दूर होय विपदा उस नर की,

जन्म-जन्म शिवपद पासी ॥

कैलासी काशी के वासी,

विनाशी मेरी सुध लीजो ।

सेवक जान सदा चरनन को,

अपनो जान कृपा कीजो ॥

तुम तो प्रभुजी सदा दयामय,

अवगुण मेरे सब ढकियो ।

सब अपराध क्षमाकर शंकर,

किंकर की विनती सुनियो ॥

शीश गंग अर्धंग पार्वती,

सदा विराजत कैलासी ।

नंदी भृंगी नृत्य करत हैं,

धरत ध्यान सुर सुखरासी ॥

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