दुर्गा पूजा 2026 का देवी पक्ष महाषष्ठी शुक्रवार, 16 अक्टूबर को आरंभ होगा। महासप्तमी शनिवार, 17 अक्टूबर, महाअष्टमी रविवार, 18 अक्टूबर (अनेक बंगीय पंचांगों के अनुसार सोमवार, 19 अक्टूबर), महानवमी 19 या 20 अक्टूबर और विजयादशमी (दशहरा) मंगलवार, 20 अक्टूबर को मनाई जाएगी। पश्चिम बंगाल की परंपरा के अनुसार माँ की विदाई और विसर्जन (बिजोया) बुधवार, 21 अक्टूबर को होगा। इससे पूर्व महालय अमावस्या शनिवार, 10 अक्टूबर तथा शारदीय नवरात्रि का आरंभ (घटस्थापना) रविवार, 11 अक्टूबर को है।
अष्टमी-नवमी की तारीखों में एक दिन का अंतर इस वर्ष तिथियों के संधिकाल में आने के कारण है – इसे नीचे विशेष अनुभाग में समझाइए गए दो पंचांग मानकों (मध्याह्न और सूर्योदय) से जोड़ा गया है। पूजा-समिति या पुरोहित के पंचांग को ही मान्य रखें।
दुर्गा पूजा 2026 – तिथि, वार और प्रमुख अनुष्ठान
| अनुष्ठान | तिथि (2026) | वार | तिथि काल (भारतीय समयानुसार) |
|---|---|---|---|
| महालय अमावस्या | 10 अक्टूबर | शनिवार | आश्विन कृष्ण अमावस्या रात्रि 09:19 बजे तक |
| घटस्थापना (नवरात्रि आरंभ) | 11 अक्टूबर | रविवार | प्रतिपदा 10 अक्टूबर रात्रि 09:19 से 11 अक्टूबर रात्रि 09:30 तक |
| महाषष्ठी – अकाल बोधन | 16 अक्टूबर | शुक्रवार | षष्ठी प्रातः 03:25 से 17 अक्टूबर प्रातः 05:54 तक |
| महासप्तमी – नवपत्रिका/कोलबौ पूजा | 17 अक्टूबर | शनिवार | सप्तमी प्रातः 05:54 से 18 अक्टूबर प्रातः 08:27 तक |
| महाअष्टमी – कुमारी पूजा | 18 या 19 अक्टूबर | रविवार / सोमवार | अष्टमी 18 अक्टूबर प्रातः 08:27 से 19 अक्टूबर प्रातः 10:51 तक |
| संधि पूजा (अष्टमी-नवमी संधिकाल) | 19 अक्टूबर | सोमवार | लगभग प्रातः 10:27 से 10:51 (अष्टमी तिथि के अंतिम 24 मिनट) |
| महानवमी – हवन व भोग | 19 या 20 अक्टूबर | सोमवार / मंगलवार | नवमी 19 अक्टूबर प्रातः 10:51 से 20 अक्टूबार अपराह्न 12:50 तक |
| विजयादशमी – दशहरा | 20 अक्टूबर | मंगलवार | दशमी 20 अक्टूबर अपराह्न 12:50 से 21 अक्टूबर अपराह्न 02:11 तक |
| बिजोया – विसर्जन, सिंदूर खेला | 21 अक्टूबर | बुधवार | दशमी तिथि प्रातः से उपस्थित (सूर्योदय पद्धति) |
(तिथि-गणना दृक पंचांग के आधार पर, सभी समय भारतीय समयानुसार। महाषष्ठी से महादशमी तक कुल पाँच प्रमुख दिन देवी की आराधना के होते हैं।)
महालय से घटस्थापना – उत्सव की भूमिका
परंपरा के अनुसार महालय अमावस्या को माँ दुर्गा पिता हिमालय के घर आगमन की तैयारी करती हैं। उसी दिन पितृ पक्ष की समाप्ति होने से स्नान, दान और तर्पण को विशेष महत्व माना जाता है और प्रातःकालीन ‘महिषासुरमर्दिनी’ आरति एवं पाठ का वातावरण पूरे बंगाल में पूजा की गिनती आरंभ कर देता है। उसके ठीक अगले दिन, 11 अक्टूबर (रविवार) को आश्विन शुक्ल प्रतिपदा पर घटस्थापना के साथ शारदीय नवरात्रि के नौ दिन आरंभ होंगे। धर्मग्रंथों के निर्देश अनुसार पितृ अमावस्या के अगले दिन से ही देवी पक्ष का शुभ कार्य माना जाता है।
अष्टमी-नवमी का दिन क्यों बदलता है?
इस वर्ष अष्टमी तिथि 18 अक्टूबर प्रातः 08:27 बजे आरंभ होकर 19 अक्टूबर प्रातः 10:51 बजे समाप्त होती है। 18 अक्टूबर को मध्याह्न में अष्टमी विद्यमान है, इसलिए दृक पंचांग के अनुसार महाअष्टमी 18 अक्टूबर को दिखाई देती है; किंतु बंगीय पुरोहिती प्रणाली सूर्योदय काल में तिथि की उपस्थिति देखती है – उस मानक से अष्टमी 19 अक्टूबर को है और उसी दिन प्रातः संधि पूजा (10:27 से 10:51) का संधिकाल बनता है। इसी कारण नवमी और उससे जुड़ी आयुध पूजा कई जगह 20 अक्टूबर को मनेगी। दोनों पद्धतियाँ परंपरागत रूप से प्रचलित हैं; मंडप अपनी पूजा-समिति के पंचांग के अनुसार ही अनुष्ठान तय करे।
बिजोया – माँ की विदाई (21 अक्टूबर)
दशमी तिथि 20 अक्टूबर अपराह्न 12:50 बजे से आरंभ होकर 21 अक्टूबर अपराह्न 02:11 बजे तक रहेगी। भारत के अधिकतर प्रदेशों में दशहरा 20 अक्टूबर को – अपराजिता और शमी पूजन, रामरावण के मध्याह्न युद्ध और रावण दहन के प्रसंग के साथ – मनाया जाएगा। बंगाल में उसी दिन नवमी के शेष अनुष्ठान और अगली सुबह 21 अक्टूबर को बिजोया होगा: सिंदूर खेला, ढाक की थाप के बीच ‘असचे बोरतो’ के जयकारे और घाट पर विसर्जन – परंपरा के अनुसार माँ अपने कैलाश पति शिव के पास लौटती हैं।
दुर्गा पूजा का महत्व
मान्यता के अनुसार माँ दुर्गा ने नौ दिन तक चले भयंकर युद्ध के बाद दशम दिन महिषासुर का वध किया; इसीलिए नवरात्रि-नवमी और विजयादशमी शक्ति की जीत – अधर्म पर धर्म की विजय – के प्रतीक दिन हैं। मार्कंडेय पुराण की देवीमाहात्म्य (दुर्गा सप्तशती) के पाठ के साथ यह व्रत सम्पूर्ण देश में आस्था से जुड़ा है। परंपरा के अनुसार इस अवसर पर माँ लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और कार्तिकेय भी माता के साथ विराजते हैं।
दुर्गा पूजा की पूजा विधि – संक्षेप में
क्षेत्र, कूल और परंपरा के अनुसार विधियाँ भिन्न होती हैं; मुख्य अनुष्ठान इस प्रकार माने जाते हैं:
- षष्ठी – अकाल बोधन व आमंत्रण: संध्या-रात्रि में कल्पारम्भ, अकालबोधन, बिल्व-निमंत्रण व अधिवास से माँ का आवाहन।
- सप्तमी – नवपत्रिका स्नान: प्रातः नौ पत्रिकाओं का स्नान कराकर उन्हें ‘कोलबौ’ रूप में माँ के अंचल में स्थापित करना।
- अष्टमी – कुमारी एवं संधि पूजा: कुमारी पूजन; अष्टमी-नवमी संधिकाल में 48 मिनट की संधि पूजा व चण्डीहोम।
- नवमी – हवन व भोग: महानवमी हवन, नैवेद्य/भोग का वितरण।
- दशमी – आरती, शमी पूजन और विसर्जन: अपराजिका पूजा, विजय मुहूर्त में शमी/आपड़ा पूजन, फिर सिंदूर खेला व घाट पर विसर्जन।
षोडशोपचार की सम्पूर्ण संस्कृत विधि के लिए पढ़ें – श्री दुर्गा षोडशोपचार पूजा और दुर्गा पूजा पुष्पांजलि मंत्र।
दुर्गा पूजा के पाठ, मंत्र और आरती
- दुर्गा चालीसा पाठ – कब और कैसे करें
- श्री दुर्गा नवरात्रि व्रत कथा
- दुर्गा कवच पाठ
- दुर्गा मानस पूजा (PDF)
- शारदीय नवरात्रि 2026 – मुहूर्त और पूजा विधि
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नोट: इस पृष्ठ की तिथियाँ और मुहूर्त वर्ष 2026 के लिए दृक पंचांग तथा प्रचलित पंचांगों के मिलान से लिए गए हैं। स्थान-विशेष के लिए अपने नगर के पंचांग या पूजा-समिति से पुष्टि कर लें।
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