भारत की देवभूमि, हिमाचल प्रदेश की शांत और हरी-भरी कांगड़ा घाटी में एक ऐसा रहस्य छिपा है, जो विज्ञान को भी चुनौती देता है। यहाँ स्थित है ज्वाला देवी मंदिर, जिसे ज्वालामुखी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत है इसकी अखंड ज्योति (Eternal Flame), जो बिना किसी तेल या बाती के हजारों सालों से लगातार जल रही है।
ये सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि एक चमत्कारी स्थल है जहाँ आस्था और रहस्य (mystery) एक साथ मिलते हैं। आइए जानते हैं इस अद्भुत मंदिर की प्राचीन कथा, महत्व और इसके पीछे के अनसुलझे रहस्य।
ज्वाला देवी मंदिर का रहस्यमयी इतिहास
ज्वाला देवी मंदिर का इतिहास माता सती की कथा से जुड़ा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान शिव अपनी पत्नी सती के मृत शरीर को लेकर ब्रह्मांड में तांडव कर रहे थे, तो सृष्टि को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के 51 टुकड़े कर दिए। ये टुकड़े जहाँ-जहाँ गिरे, वो स्थान शक्ति पीठ (Shakti Peeth) कहलाए।
मान्यता है कि माता सती की जिह्वा (जीभ) इसी स्थान पर गिरी थी। यही कारण है कि यहाँ देवी की कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि देवी अग्नि रूप में निवास करती हैं। मंदिर में नौ अलग-अलग ज्वालाएं जलती हैं, जो देवी के नौ रूपों को दर्शाती हैं: महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका और अंजी देवी।
बिना तेल-बाती के जलने वाली ‘अग्नि ज्योतियां’
ज्वाला देवी मंदिर का सबसे बड़ा चमत्कार इसकी नौ अखंड ज्योतियां हैं। ये सदियों से लगातार बिना किसी बाहरी मदद (external help) के जल रही हैं। कई बार वैज्ञानिकों और भूगर्भशास्त्रियों (geologists) ने इस रहस्य को सुलझाने की कोशिश की है। उन्होंने पाया कि मंदिर के नीचे से प्राकृतिक गैस (natural gas) निकल रही है, जिसके कारण ये ज्योति जलती हैं।
लेकिन, यहाँ एक बड़ा सवाल उठता है: अगर यह सिर्फ प्राकृतिक गैस है, तो यह इतने हजारों सालों से बिना बुझे कैसे जल रही है? और यह कहाँ से आ रही है? इसके अलावा, इन ज्योतियों की लौ (flame) का रंग अलग-अलग है और वे अलग-अलग आकार में जलती हैं, जो सिर्फ प्राकृतिक गैस से संभव नहीं है। भक्तों का मानना है कि यह देवी की अलौकिक शक्ति (divine power) का ही प्रमाण है।
प्राचीन कथा और मुगल शासक अकबर का चमत्कार
इस मंदिर से जुड़ी एक और दिलचस्प कहानी मुगल शासक अकबर की है। अकबर को जब इस मंदिर के चमत्कार के बारे में पता चला, तो उसे विश्वास नहीं हुआ। उसने अपनी सेना के साथ मंदिर में आकर इन ज्योतियों को बुझाने की कोशिश की। अकबर ने ज्योति को बुझाने के लिए लोहे के तवे लगवाए, उसपर पानी की धाराएं डालीं और यहाँ तक कि नहर भी बनवाई ताकि ज्योति बुझ जाए। लेकिन हर बार ज्वाला और भी तेज़ी से जलने लगी।
इस चमत्कार को देखकर अकबर का अहंकार (ego) टूट गया। उसने हार मानकर देवी के चरणों में शीश झुकाया और एक सोने का छत्र (umbrella) भेंट किया। कहा जाता है कि देवी ने उसका छत्र भी स्वीकार नहीं किया और वह धातु (metal) से बनी छत्र एक अलग ही धातु में बदल गई, जिसकी पहचान आज भी नहीं हो पाई है। यह छत्र आज भी मंदिर में मौजूद है और इसे ‘छत्र चमत्कार’ के नाम से जाना जाता है।
मंदिर का महत्व और दर्शन का समय
ज्वाला देवी मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक केंद्र (spiritual center) है, जहाँ हर साल लाखों भक्त अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं। नवरात्रि के दौरान यहाँ का नजारा बेहद अद्भुत होता है। दूर-दूर से श्रद्धालु पैदल यात्रा करके यहाँ आते हैं।
मंदिर सुबह 6 बजे से रात 9 बजे तक खुला रहता है। यहाँ के वातावरण में एक अलग ही शांति और सकारात्मक ऊर्जा (positive energy) महसूस होती है।
कैसे पहुँचें
- हवाई मार्ग – निकटतम हवाई अड्डा गग्गल (कांगड़ा) है, जो मंदिर से लगभग 50 किमी दूर है।
- रेल मार्ग – निकटतम रेलवे स्टेशन पठानकोट है, जहाँ से टैक्सी या बस से पहुँचा जा सकता है।
- सड़क मार्ग – ज्वालामुखी मंदिर राष्ट्रीय राजमार्ग 1A से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।
Found a Mistake or Error? Report it Now

