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क्या है गौण पौष पुत्रदा एकादशी का महत्व? जानें संतान प्राप्ति के अचूक उपाय और व्रत नियम।

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हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष स्थान है, लेकिन जब बात पुत्रदा एकादशी की आती है, तो इसका महत्व दोगुना हो जाता है। साल में दो बार पुत्रदा एकादशी आती है – एक श्रावण मास में और दूसरी पौष मास में। पौष शुक्ल पक्ष की एकादशी को मुख्य रूप से संतान सुख की कामना के लिए रखा जाता है।

अक्सर भक्तों के बीच ‘गौण’ और ‘शुद्ध’ एकादशी को लेकर भ्रम रहता है। आइए जानते हैं क्या है गौण पौष पुत्रदा एकादशी और क्यों यह नि:संतान दंपत्तियों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।

क्या है ‘गौण’ एकादशी का अर्थ?

धार्मिक शब्दावली में जब एकादशी दो दिनों तक व्याप्त होती है, तो पहले दिन वाली को ‘विद्धा’ या ‘शुद्ध’ एकादशी कहा जाता है (जिसे गृहस्थ रखते हैं), और दूसरे दिन वाली को ‘गौण’ या ‘दूजी’ एकादशी कहा जाता है।

गौण एकादशी मुख्य रूप से वैष्णव संप्रदाय, संन्यासियों और मोक्ष की इच्छा रखने वाले भक्तों के लिए श्रेष्ठ मानी जाती है। मान्यता है कि गौण एकादशी का व्रत करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है और भक्ति मार्ग सुलभ होता है।

गौण पौष पुत्रदा एकादशी का आध्यात्मिक महत्व

पौष मास की इस एकादशी का सीधा संबंध वंश वृद्धि और संतान के कल्याण से है। पद्म पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति इस दिन विधि-विधान से व्रत रखता है, उसे न केवल योग्य संतान की प्राप्ति होती है, बल्कि मृत्यु के पश्चात उसे स्वर्ग लोक में स्थान मिलता है।

  • यह व्रत जाने-अनजाने में हुए मानसिक और शारीरिक पापों को धो देता है।
  • भगवान श्रीहरि विष्णु के ‘नारायण’ स्वरूप की पूजा करने से जीवन की दरिद्रता दूर होती है।
  • कई बार पितृ दोष के कारण संतान प्राप्ति में बाधा आती है, यह व्रत उस दोष के प्रभाव को भी कम करता है।

संतान प्राप्ति के अचूक और विशेष उपाय

यदि आप लंबे समय से संतान सुख से वंचित हैं, तो इस एकादशी पर निम्नलिखित उपाय श्रद्धापूर्वक करें:

  • एकादशी के दिन पति-पत्नी साथ मिलकर भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप (लड्डू गोपाल) के सामने “ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः।।” मंत्र की कम से कम 5 माला जाप करें।
  • भगवान विष्णु को पीले रंग के फल और फूल अत्यंत प्रिय हैं। मंदिर में जाकर पीले फल, चने की दाल और केसरिया मिठाई का दान करें।
  • शाम के समय पीपल के पेड़ के नीचे शुद्ध घी का दीपक जलाएं और सात बार परिक्रमा करें। पीपल में विष्णु जी का वास माना जाता है।
  • इस दिन गाय और उसके बछड़े को हरा चारा और गुड़ खिलाना वंश वृद्धि के लिए बहुत शुभ माना जाता है।

गौण पौष पुत्रदा एकादशी व्रत के नियम और पूजा विधि

पुत्रदा एकादशी का व्रत अत्यंत कठिन होता है, इसके नियमों का पालन दशमी तिथि से ही शुरू हो जाता है।

  • दशमी की रात से ही ब्रह्मचर्य का पालन करें और सात्विक भोजन (बिना लहसुन-प्याज) लें।
  • एकादशी के दिन चावल खाना और घर में बनाना वर्जित है।
  • संभव हो तो रात्रि में विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें और कीर्तन करें।
  • सुबह जल्दी उठकर स्नान के बाद हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।
  • चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति स्थापित करें।
  • दक्षिणावर्ती शंख से भगवान का दूध और जल से अभिषेक करें।
  • तुलसी दल (तुलसी के पत्ते) के बिना भगवान भोग स्वीकार नहीं करते, इसलिए भोग में तुलसी जरूर रखें।
  • पुत्रदा एकादशी की व्रत कथा जरूर सुनें या पढ़ें, इसके बिना व्रत अधूरा माना जाता है।

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