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द्विजप्रिय संकष्टी – चार मुखों वाले गणपति की आराधना से कैसे मिलता है आरोग्य और सौभाग्य?

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हिन्दू संस्कृति में हर व्रत के पीछे एक गहरा मनोविज्ञान और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का रहस्य छिपा होता है। द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी उन्हीं में से एक है। अक्सर लोग संकष्टी चतुर्थी को केवल ‘कष्ट हरने वाला दिन’ मानते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस दिन पूजे जाने वाले भगवान गणेश के ‘चतुर्मुख’ (चार मुखों वाले) स्वरूप का सीधा संबंध आपकी सेहत और आपके भाग्य की चमक से है? आइए, आज इस लेख में गहराई से समझते हैं कि द्विजप्रिय गणेश की साधना कैसे आपके जीवन में ‘आरोग्य’ (Health) और ‘सौभाग्य’ (Prosperity) का द्वार खोलती है।

कौन हैं ‘द्विजप्रिय’ गणेश?

शास्त्रों के अनुसार, भगवान गणेश के 32 स्वरूपों में से छठा स्वरूप ‘द्विजप्रिय गणेश’ का है। ‘द्विज’ का अर्थ होता है जिसका दो बार जन्म हुआ हो – एक शारीरिक और दूसरा आध्यात्मिक।

  • चार मुखों की महिमा – द्विजप्रिय गणेश के चार मुख चार वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद) के प्रतीक हैं। यह स्वरूप दर्शाता है कि भगवान चारों दिशाओं से अपने भक्तों की रक्षा करते हैं।
  • हस्त मुद्राएं – उनके चार हाथों में माला, कमंडल, दंड और शास्त्र होते हैं, जो अनुशासन, ज्ञान और पवित्रता का संदेश देते हैं।
  • वर्ण (रंग) – इनका वर्ण चंद्रमा के समान शुभ्र (सफेद) या स्वर्ण जैसा आभायुक्त माना गया है, जो मन को शीतलता प्रदान करता है।

आरोग्य (Health) का वरदान – एक आध्यात्मिक विज्ञान

अक्सर लोग पूछते हैं कि गणेश पूजा से स्वास्थ्य कैसे सुधर सकता है? इसका उत्तर ‘चंद्र तत्व’ में छिपा है।

  • मानसिक शांति और रक्तचाप – द्विजप्रिय संकष्टी के दिन चंद्रमा अपनी विशिष्ट स्थिति में होता है। इस दिन व्रत रखने और ध्यान करने से शरीर में ‘जल तत्व’ संतुलित होता है, जिससे तनाव कम होता है और उच्च रक्तचाप (Blood Pressure) जैसी समस्याओं में राहत मिलती है।
  • सकारात्मक ऊर्जा का संचार – चार मुखों वाले गणेश का ध्यान करने से हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ जागृत होती हैं। जब हम उनके शांत स्वरूप को देखते हैं, तो हमारे मस्तिष्क में ‘डोपामाइन’ का स्तर सुधरता है, जो अवसाद (Depression) से लड़ने में मदद करता है।

सौभाग्य (Prosperity) के लिए अचूक अनुष्ठान

यदि आपके काम बनते-बनते बिगड़ जाते हैं या घर में दरिद्रता का वास महसूस होता है, तो द्विजप्रिय संकष्टी पर ये तीन विशेष कार्य अवश्य करें:

  • ‘ऋणमोचक’ साधना – इस दिन गणेश जी के सामने चमेली के तेल का दीपक जलाएं और ऋणहर्ता गणेश स्तोत्र का पाठ करें। माना जाता है कि द्विजप्रिय स्वरूप ऋण (कर्ज) के दलदल से बाहर निकालने में सबसे अधिक प्रभावशाली है।
  • दूर्वा और हल्दी का अर्पण – चार मुख वाले गणेश जी को 21 हल्दी की गांठें और दूर्वा चढ़ाएं। हल्दी सौभाग्य का प्रतीक है और दूर्वा जीवन शक्ति (Vitality) की। पूजा के बाद इस हल्दी को एक पीले कपड़े में बांधकर अपनी तिजोरी में रख दें।
  • चार मुखी दीपक का दान – शाम को चंद्रोदय के समय किसी मंदिर में या अपने घर के मुख्य द्वार पर चौमुखी (चार मुखों वाला) घी का दीपक जलाएं। यह चारों दिशाओं से आने वाली बाधाओं को रोकता है।

द्विजप्रिय संकष्टी व्रत की सरल पूजन विधि

  • सुबह स्नान के बाद हाथ में जल लेकर आरोग्य और सौभाग्य की प्राप्ति का संकल्प लें।
  • भगवान को पीले वस्त्र पहनाएं। उन्हें सफेद चंदन का तिलक लगाएं।
  • द्विजप्रिय गणेश को मिश्री, नारियल और केले का भोग अत्यंत प्रिय है।
  • रात को चंद्रमा को अर्घ्य दें। अर्घ्य देते समय जल में थोड़ा सा कच्चा दूध और सफेद फूल जरूर मिलाएं।

क्यों खास है यह व्रत? (Unique Insight)

अन्य चतुर्थी व्रतों की तुलना में द्विजप्रिय संकष्टी इसलिए निराली है क्योंकि यह ‘आत्म-साक्षात्कार’ का अवसर देती है। यह व्रत हमें सिखाता है कि जिस तरह गणेश जी के चार मुख चारों दिशाओं पर नजर रखते हैं, उसी तरह हमें भी अपने आहार, विचार, व्यवहार और व्यापार – इन चारों पर नियंत्रण रखना चाहिए। जब ये चार चीजें संतुलित होती हैं, तो ‘सौभाग्य’ अपने आप पीछे-पीछे चला आता है।

सावधानी और सुझाव

  • इस दिन किसी पर भी क्रोध न करें, क्योंकि यह आपकी संचित ऊर्जा को नष्ट कर देता है।
  • पूजा स्थान पर साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें। सुगंधित धूप (जैसे गुग्गल या लोबान) का प्रयोग करें ताकि वातावरण की नकारात्मकता दूर हो।

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