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द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2026 – जानें शुभ मुहूर्त, चंद्रोदय का समय और संपूर्ण पूजा विधि

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साल 2026 में भगवान गणेश की आराधना का महापर्व द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी (Dwijapriya Sankashti Chaturthi) भक्तों के लिए विशेष खुशियां और सौभाग्य लेकर आ रहा है। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाए जाने वाले इस व्रत का हिंदू धर्म में गहरा महत्व है।

मान्यता है कि इस दिन गणपति के ‘द्विजप्रिय’ स्वरूप की पूजा करने से न केवल कष्टों का निवारण होता है, बल्कि व्यक्ति को असीम ज्ञान और स्वास्थ्य की प्राप्ति भी होती है। यदि आप भी 2026 में बप्पा को प्रसन्न करना चाहते हैं, तो यहाँ जानिए इस व्रत की सही तारीख, शुभ मुहूर्त और पूजा की वे छोटी-छोटी बारीकियाँ जो अक्सर हम भूल जाते हैं।

द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2026 – तिथि और शुभ मुहूर्त

साल 2026 में यह पावन पर्व फरवरी के महीने में पड़ रहा है। पंचांग की गणना के अनुसार, इस बार चतुर्थी तिथि का संयोग बहुत ही शुभ है।

  • दिनांक – 5 फरवरी 2026, गुरुवार
  • चतुर्थी तिथि प्रारंभ – 5 फरवरी, प्रातः 12:09 बजे से
  • चतुर्थी तिथि समाप्त – 6 फरवरी, प्रातः 12:22 बजे तक
  • चंद्रोदय का समय – रात्रि 09:48 बजे (अनुमानित*)
  • ध्यान दें – चंद्रोदय का समय आपके शहर के अनुसार 10-15 मिनट आगे-पीछे हो सकता है। व्रत खोलने से पहले स्थानीय पंचांग या ऐप में अपने शहर का समय अवश्य देख लें।

क्या है ‘द्विजप्रिय’ संकष्टी चतुर्थी का महत्व?

‘संकष्टी’ का अर्थ ही है ‘संकट हरने वाली’। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसे द्विजप्रिय क्यों कहा जाता है? धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान गणेश का यह छठा स्वरूप है। ‘द्विज’ का अर्थ होता है ‘दो बार जन्म लेने वाला’ (जैसे ब्राह्मण या पक्षी) और ‘प्रिय’ मतलब जो उन्हें प्रिय हो।

माना जाता है कि इस विशिष्ट चतुर्थी पर व्रत रखने से व्यक्ति के जीवन से अज्ञानता का अंधेरा मिट जाता है। यदि आप स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं या करियर में रुकावटें आ रही हैं, तो 2026 का यह व्रत आपके लिए ‘गेम-चेंजर’ साबित हो सकता है।

द्विजप्रिय’ संकष्टी चतुर्थी संपूर्ण पूजा विधि

अक्सर लोग पूजा तो करते हैं, लेकिन सही विधि की जानकारी न होने के कारण मन में संशय रह जाता है। यहाँ एक सरल और प्रामाणिक विधि दी गई है जिसे आप घर पर आसानी से कर सकते हैं:

  • कोशिश करें कि सूर्योदय से पहले उठें। स्नान के पानी में थोड़ा गंगाजल और तिल मिलाएं। यह शरीर और मन दोनों की शुद्धि के लिए उत्तम है।
  • घर के मंदिर में दीप जलाएं और हाथ में थोड़ा जल व अक्षत लेकर संकल्प लें: “हे विघ्नहर्ता, आज मैं (अपना नाम) आपके द्विजप्रिय स्वरूप का व्रत रख रहा/रही हूँ। मेरी पूजा स्वीकार करें।”
  • यह व्रत ‘निर्जला’ (बिना पानी के) या ‘फलाहारी’ (फल खाकर) दोनों तरह से रखा जा सकता है। यह आपकी शारीरिक क्षमता पर निर्भर करता है। दिन भर मन में ‘ॐ गं गणपतये नमः’ का जाप करते रहें।
  • असली पूजा शाम को चंद्रोदय से पहले की जाती है। एक साफ चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं और भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित करें।
  • बप्पा को तिल के लड्डू, मोदक और 21 दूर्वा (दूब घास) अति प्रिय हैं। द्विजप्रिय चतुर्थी पर विशेष रूप से गुड़ और तिल का भोग लगाने की परंपरा है।
  • लाल गुड़हल (Hibiscus) या गेंदे का फूल चढ़ाएं। ‘संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा’ का पाठ अवश्य करें। इसके बिना व्रत अधूरा माना जाता है।
  • इस व्रत का समापन चंद्रमा को अर्घ्य देकर ही होता है। थाली में चंदन, अक्षत, फूल और थोड़ा सा दूध रखें। चंद्रोदय होने पर चंद्रमा को जल अर्पित करें और प्रार्थना करें: “गगनार्णवमाणिक्य चन्द्र दाक्षायणीपते। गृहाणार्घ्यं मया दत्तं गणेशप्रतिरूपक॥” (हे गगन रूपी समुद्र के माणिक्य, गणेश के प्रतिरूप चंद्रमा, मेरे द्वारा दिया गया अर्घ्य स्वीकार करें।)

शक्तिशाली मंत्र (Mantra for Success)

पूजा के समय इस मंत्र का 108 बार जाप करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है: “ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं गं गणपतये वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा॥” यदि यह कठिन लगे, तो सरल मंत्र जपें: “ॐ द्विजप्रियाय नमः”

ध्यान रखने योग्य कुछ खास बातें (Do’s and Don’ts)

  • याद रखें, भगवान गणेश की पूजा में तुलसी दल का प्रयोग वर्जित है।
  • पूजा के दौरान काले कपड़े पहनने से बचें; पीले या लाल वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है।
  • व्रत खोलने के बाद सात्विक भोजन ही ग्रहण करें। प्याज, लहसुन या तामसिक भोजन से परहेज करें।
  • लोक मान्यताओं के अनुसार, चतुर्थी के चंद्रमा को सीधे देखने से बचना चाहिए (सिर नीचा करके अर्घ्य दें), ताकि कलंक दोष न लगे।

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