घर में किसी भी देवी-देवता का आवाहन करना केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि एक नए सदस्य के स्वागत जैसा अनुभव होता है। ‘ढुण्ढिराज गणेश’ का स्वरूप विशेष रूप से उन परिवारों के लिए शुभ माना जाता है जो अपने जीवन में नया रास्ता तलाश रहे हैं या घर की बाधाओं को दूर करना चाहते हैं। काशी की परंपरा और शास्त्रों के अनुसार, घर पर ढुण्ढिराज गणेश की स्थापना और पूजा कैसे करें? आइए, इस संपूर्ण मार्गदर्शिका (Complete Guide) के माध्यम से जानते हैं।
ढुण्ढिराज गणेश पूजा के लिए आवश्यक सामग्री
स्थापना से पहले इन चीजों को एकत्रित कर लें ताकि पूजा के बीच में उठना न पड़े:
- प्रतिमा – मिट्टी के बने ढुण्ढिराज गणेश (पीले या लाल रंग के वस्त्र वाले)।
- आसन – लाल या पीला सूती/रेशमी कपड़ा।
- कलश – तांबे या पीतल का लोटा, आम के पत्ते, और जटा वाला नारियल।
- पंचामृत – दूध, दही, शहद, शुद्ध घी और शक्कर।
- विशेष वस्तुएं – 21 दूर्वा की गांठें, सिंदूर, जनेऊ, और अक्षत (बिना टूटे चावल)।
- भोग – घर के बने मोदक या बेसन के लड्डू।
- अन्य – धूप, दीप, अगरबत्ती, कपूर, और सुपारी।
ढुण्ढिराज गणेश – स्थापना विधि
ढुण्ढिराज गणेश की स्थापना घर के उत्तर-पूर्व कोने (ईशान कोण) में करना सबसे उत्तम होता है।
- सबसे पहले पूजा स्थान को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें।
- एक छोटी लकड़ी की चौकी रखें, उस पर लाल कपड़ा बिछाएं और थोड़े अक्षत का ढेर बनाकर उस पर गणेश जी को विराजमान करें।
- गणेश जी के दाईं ओर एक कलश स्थापित करें। कलश के मुख पर कलावा बांधें और उस पर नारियल रखें। इसे ‘वरुण देव’ का प्रतीक माना जाता है।
- हाथ में जल और पुष्प लेकर प्रार्थना करें – “हे ढुण्ढिराज देव, आप मेरे घर में पधारें और मेरे जीवन के मार्ग को प्रशस्त करें।”
ढुण्ढिराज गणेश पूजा का विशेष क्रम
ढुण्ढिराज गणेश ‘खोजने’ के देवता हैं, इसलिए इनकी पूजा में ‘दीपक’ का बहुत महत्व है।
- सिंदूर लेपन – गणेश जी को सिंदूर बहुत प्रिय है। उनके मस्तक पर अनामिका उंगली से सिंदूर लगाएं।
- दूर्वा अर्पण – ‘ॐ गं गणपतये नमः’ का जाप करते हुए 21 दूर्वा चढ़ाएं। ध्यान रहे दूर्वा का मुख भगवान की ओर हो।
- विशेष मंत्र – ढुण्ढिराज के लिए इस मंत्र का जाप करें: “तस्मै ढुण्ढिराजाय नमः, सर्वविघ्नविनाशिने।”
- अखंड ज्योति – यदि संभव हो, तो स्थापना के समय से विसर्जन तक एक छोटा घी का दीपक प्रज्ज्वलित रहने दें। यह घर की नकारात्मक ऊर्जा को खोजकर बाहर करता है।
- नैवेद्य और भोग – ढुण्ढिराज गणेश को तिल और गुड़ के लड्डू का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है। यदि आप किसी विशेष कार्य की सिद्धि के लिए स्थापना कर रहे हैं, तो बुधवार के दिन 11 मोदक का भोग जरूर लगाएं।
ढुण्ढिराज गणेश – विसर्जन की सही विधि और समय
आमतौर पर चतुर्थी के दिन या डेढ़, तीन या पांच दिन बाद विसर्जन किया जाता है।
- अंतिम आरती – विसर्जन से पहले भगवान की कपूर से आरती करें और अनजाने में हुई भूल के लिए क्षमा मांगें।
- पुनरागमन की प्रार्थना – विसर्जन का अर्थ विदाई नहीं, बल्कि भगवान को उनके धाम भेजना है ताकि वे अगले साल फिर आ सकें। कहें – “गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ।”
- पारिस्थितिकी (Eco-friendly) विसर्जन – आजकल घर के आंगन में ही एक साफ टब में जल भरकर मूर्ति विसर्जित करना सबसे उत्तम है। उस मिट्टी को गमले में डाल दें, ताकि भगवान एक पौधे के रूप में आपके साथ रहें।
ढुण्ढिराज गणेश – महत्वपूर्ण सुझाव
- दिशा का ध्यान – पूजा करते समय आपका मुख पूर्व या उत्तर की ओर होना चाहिए।
- मौन साधना – स्थापना के बाद कम से कम 10 मिनट मौन रहकर भगवान के सामने बैठें। ढुण्ढिराज गणेश मौन में ही उत्तर देते हैं।
- अंधेरा न रखें – जहाँ गणेश जी की स्थापना हुई है, वहां कभी भी अंधेरा न होने दें।
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