बनारस के बारे में एक मशहूर कहावत है – “काशी की गली, और शिव की टोली”। लेकिन इस टोली का सबसे महत्वपूर्ण चेहरा, जो अक्सर गलियों की भीड़ में कहीं ओझल रह जाता है, वह है ‘ढुण्ढिराज गणेश’।
क्या आपने कभी गौर किया है कि काशी विश्वनाथ मंदिर के मुख्य द्वार की ओर बढ़ते समय, गलियों के मोड़ पर एक छोटा लेकिन अत्यंत तेजस्वी मंदिर आता है? शास्त्र कहते हैं कि यदि आपने बाबा विश्वनाथ के दर्शन कर लिए, लेकिन ‘ढुण्ढिराज’ के आगे सिर नहीं झुकाया, तो आपकी काशी यात्रा अधूरी मानी जाएगी।
आखिर क्यों एक छोटे से मंदिर का महत्व ब्रह्मांड के स्वामी बाबा विश्वनाथ से भी पहले है? आइए जानते हैं इस अद्भुत परंपरा के पीछे का आध्यात्मिक और पौराणिक रहस्य।
काशी के ‘प्रथम’ पूज्य – कौन हैं ढुण्ढिराज गणेश?
काशी विश्वनाथ मंदिर के गेट नंबर 4 के पास स्थित ढुण्ढिराज गणेश केवल एक मूर्ति नहीं, बल्कि काशी के ‘कस्टोडियन’ (संरक्षक) हैं। ‘ढुण्ढि’ शब्द का अर्थ होता है – ‘खोजने वाला’।
हिंदू धर्म में गणेश जी प्रथम पूज्य हैं, यह तो हम सब जानते हैं, लेकिन काशी में उनका ‘ढुण्ढिराज’ स्वरूप एक विशेष प्रोटोकॉल के तहत पूजा जाता है। यहाँ वे शिव के पुत्र ही नहीं, बल्कि उनके ‘मैनेजर’ और ‘मार्गदर्शक’ की भूमिका में हैं।
पौराणिक कहानी – जब शिव खुद काशी से दूर हो गए थे
इस रहस्य की जड़ें ‘काशी खंड’ की एक बहुत ही दिलचस्प कथा में छिपी हैं।
एक समय था जब काशी में राजा दिवोदास का शासन था। दिवोदास अत्यंत धर्मात्मा राजा थे, लेकिन उन्होंने ब्रह्मा जी से वरदान मांगा था कि जब तक वे काशी पर राज करेंगे, तब तक कोई भी देवता काशी में प्रवेश नहीं करेगा। इस कारण भगवान शिव को भी अपनी प्रिय नगरी काशी छोड़कर मंदराचल पर्वत पर जाना पड़ा।
शिव जी काशी के बिना व्याकुल थे। उन्होंने कई देवताओं को भेजा कि वे जाएं और राजा दिवोदास की कोई गलती ढूँढें ताकि उन्हें काशी से हटाया जा सके, लेकिन कोई सफल नहीं हुआ। अंत में, चतुर गणेश जी ने कमान संभाली।
गणेश जी ने एक बूढ़े ज्योतिषी (ब्राह्मण) का रूप धारण किया और काशी की गलियों में घूमने लगे। उन्होंने घर-घर जाकर लोगों की समस्याओं को ‘ढूँढा’ और उन्हें सही मार्ग दिखाया। धीरे-धीरे उनकी ख्याति राजा दिवोदास तक पहुँची।
गणेश जी ने राजा को ज्ञान दिया और उनके भीतर मोक्ष की इच्छा जागृत कर दी। राजा ने स्वयं ही काशी छोड़ दी और शिव जी के वापस आने का मार्ग प्रशस्त हुआ। शिव जी इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने गणेश जी को वहीं स्थापित कर दिया और कहा – “जो काशी आएगा, उसे सबसे पहले तुम्हारे दर्शन करने होंगे, तभी मेरी कृपा उसे प्राप्त होगी।”
दर्शन का ‘प्रोटोकॉल’ – पहले बेटा, फिर पिता
काशी एक आध्यात्मिक दरबार है, और दरबार के अपने नियम होते हैं।
- अनुमति का केंद्र – मान्यता है कि ढुण्ढिराज गणेश बाबा विश्वनाथ के दरबार के ‘चीफ ऑफ स्टाफ’ हैं। भक्त जब यहाँ मत्था टेकते हैं, तो एक तरह से वे शिव जी के दर्शन की ‘अनुमति’ प्राप्त करते हैं।
- पाप मुक्ति की पहली सीढ़ी – कहा जाता है कि काशी में प्रवेश करते ही व्यक्ति के पापों का हिसाब शुरू हो जाता है। ढुण्ढिराज के दर्शन करने से भक्त का मन शांत और पवित्र होता है, जिससे वह विश्वनाथ के दर्शन के योग्य बन सके।
- विघ्नहर्ता का पहरा – बाबा विश्वनाथ के चारों ओर गणेश जी के 56 स्वरूप (56 विनायक) पहरा देते हैं। इनमें ढुण्ढिराज सबसे प्रमुख हैं।
ढुण्ढिराज के दर्शन का विशेष फल
- भ्रम का नाश – यदि आपके जीवन में बहुत अधिक ‘कन्फ्यूजन’ है, तो ढुण्ढिराज के चरणों में सिंदूर चढ़ाने से मानसिक स्पष्टता आती है।
- संकटों से मुक्ति – इन्हें ‘संकष्ट नाशन’ गणेश भी कहा जाता है। पुराने बनारसी आज भी किसी नए काम की शुरुआत बाबा विश्वनाथ से पहले ढुण्ढिराज के मंदिर में हाजिरी लगाकर करते हैं।
- खोई हुई दिशा – ‘ढुण्ढि’ का अर्थ खोजना है, इसलिए यह मंदिर उन लोगों के लिए विशेष है जो जीवन का उद्देश्य या खोया हुआ करियर ढूँढ रहे हैं।
भक्त के लिए विशेष जानकारी
- कहाँ स्थित है – श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार के ठीक पास, ज्ञानवापी क्षेत्र की संकरी गली में।
- क्या चढ़ाएं – लाल सिंदूर, दूर्वा (घास) और बेसन के लड्डू।
- मंत्र – दर्शन करते समय इस सरल मंत्र का जाप करें:
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