|| मत्स्य जयन्ती कथा ||
मत्स्य जयन्ती भगवान विष्णु के प्रथम अवतार, ‘मत्स्य अवतार’ के प्राकट्य का उत्सव है। यह पर्व प्रतिवर्ष चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। पुराणों के अनुसार, जब-जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है या सृष्टि पर संकट आता है, तब-तब भगवान विष्णु अवतार धारण करते हैं। मत्स्य अवतार की कथा न केवल एक रोमांचक वृत्तांत है, बल्कि यह प्रलय, जीव रक्षा और ज्ञान के संरक्षण का प्रतीक भी है।
सतयुग के दौरान ‘सत्यव्रत’ नाम के एक प्रतापी और धर्मपरायण राजा थे, जो बाद में ‘वैवस्वत मनु’ के नाम से विख्यात हुए। एक दिन जब राजा कृतमाला नदी में तर्पण कर रहे थे, तो उनकी अंजलि में जल के साथ एक छोटी सी मछली आ गई।
जैसे ही राजा ने मछली को पुनः नदी में छोड़ना चाहा, वह नन्हीं मछली बोली – “हे राजन! मुझे इस जल में मत छोड़िए, यहाँ बड़े जीव मुझे खा जाएँगे। मेरी रक्षा कीजिए।” दयालु राजा ने उस मछली को अपने कमंडल में डाल लिया।
कमंडल में आते ही मछली का आकार आश्चर्यजनक रूप से बढ़ने लगा। कुछ ही क्षणों में वह मछली इतनी बड़ी हो गई कि कमंडल छोटा पड़ गया। राजा ने उसे एक मटके में डाला, फिर एक बड़े सरोवर में और अंततः उसे समुद्र में छोड़ना पड़ा। समुद्र में भी उस विशाल मत्स्य ने अपना विस्तार जारी रखा।
यह देखकर राजा सत्यव्रत चकित रह गए और समझ गए कि यह कोई साधारण मछली नहीं है। उन्होंने हाथ जोड़कर प्रार्थना की – “हे प्रभु! आप कौन हैं? आपकी यह माया अत्यंत विस्मयकारी है। कृपया अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट करें।”
तब भगवान विष्णु ने अपने चतुर्भुज रूप में दर्शन दिए और कहा – “हे राजन! आज से सातवें दिन एक प्रलयकारी जलवृष्टि होगी, जिससे संपूर्ण त्रिलोकी जलमग्न हो जाएगी। समस्त सृष्टि का विनाश निश्चित है।”
भगवान ने अवतार लेने का एक मुख्य कारण यह भी बताया कि ‘हयग्रीव’ नामक दैत्य ने ब्रह्मा जी के मुख से निकले वेदों को चुरा लिया है और उन्हें समुद्र की गहराइयों में छिपा दिया है। बिना वेदों के ज्ञान के, नई सृष्टि का निर्माण असंभव था। अतः भगवान को मत्स्य रूप धरकर उन वेदों को पुनः प्राप्त करना था।
भगवान ने राजा सत्यव्रत को निर्देश दिया – “जब प्रलय का जल बढ़ने लगे, तब एक विशाल नौका तुम्हारे पास आएगी। तुम उसमें समस्त औषधियों, बीजों, पशु-पक्षियों के जोड़ों और सप्तऋषियों को लेकर सवार हो जाना। मैं स्वयं मत्स्य रूप में वहाँ उपस्थित रहूँगा।”
ठीक सातवें दिन मूसलाधार वर्षा हुई और समुद्र अपनी मर्यादा लांघकर धरती को निगलने लगा। तभी वहां एक विशाल स्वर्ण नौका आई। राजा ने सभी जीवों और ऋषियों के साथ उसमें शरण ली। भगवान मत्स्य प्रकट हुए, जिनके मस्तक पर एक विशाल सींग था। राजा ने वासुकी नाग को रस्सी बनाकर उस नौका को मत्स्य भगवान के सींग से बाँध दिया।
प्रलय के उस भीषण काल में, जब चारों ओर केवल जल ही जल था, भगवान मत्स्य ने राजा सत्यव्रत और सप्तऋषियों को आत्मज्ञान का उपदेश दिया। भगवान द्वारा दिया गया यही दिव्य ज्ञान ‘मत्स्य पुराण’ के नाम से जाना जाता है। इसी दौरान भगवान ने दैत्य हयग्रीव का वध किया और वेदों को सुरक्षित निकालकर ब्रह्मा जी को पुनः सौंप दिया।
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