हिंदू धर्मग्रंथों और पुराणों के अनुसार, मीन संक्रान्ति वह पावन समय है जब सूर्य देव कुंभ राशि का त्याग कर अपने गुरु बृहस्पति की राशि ‘मीन’ में प्रवेश करते हैं। इसे ‘मलमास’ या ‘खरमास’ के प्रारंभ का प्रतीक भी माना जाता है। मीन संक्रान्ति की कथा मुख्य रूप से सूर्य देव के घोड़ों और उनकी निरंतर यात्रा से जुड़ी है।
|| मीन संक्रान्ति (खरमास) की पौराणिक कथा ||
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्य देव सात घोड़ों के रथ पर सवार होकर ब्रह्मांड की परिक्रमा करते हैं। सूर्य देव को आदेश है कि वे कभी रुकें नहीं, क्योंकि उनके रुकने से सृष्टि का चक्र और समय की गति थम जाएगी।
सूर्य देव के रथ के सात घोड़े निरंतर दौड़ते रहने के कारण अत्यधिक प्यास और थकान से व्याकुल हो गए। उन्हें देख सूर्य देव का हृदय द्रवित हो उठा। वे घोड़ों को विश्राम देना चाहते थे और उन्हें पानी पिलाना चाहते थे, लेकिन उनके सामने धर्मसंकट यह था कि यदि रथ रुका, तो अनर्थ हो जाएगा।
जब सूर्य देव एक जलाशय (कुंड) के किनारे पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि वहां दो ‘खर’ (गदहे) खड़े थे। सूर्य देव ने अपने प्यासे घोड़ों को पानी पीने के लिए वहीं छोड़ दिया और रथ की गति बनाए रखने के लिए उन दो खर (गदहों) को अपने रथ में जोत लिया।
चूंकि गदहे घोड़ों की तुलना में बहुत धीमी गति से चलते हैं और वे सूर्य देव के तेज को सहन करने में भी सक्षम नहीं थे, इसलिए रथ की गति अत्यंत धीमी हो गई।
जैसे ही सूर्य देव ने घोड़ों की जगह गदहों को जोता, उनकी गति मंद पड़ गई और उनका तेज भी कुछ कम हो गया। इसी कारण इस पूरे माह को ‘खरमास’ (खर + मास) कहा जाने लगा। पूरे एक माह तक सूर्य देव इन्हीं गदहों के सहारे धीमी गति से चलते रहे ताकि उनके घोड़े विश्राम कर अपनी ऊर्जा पुनः प्राप्त कर सकें।
जब सूर्य देव मीन राशि का चक्र पूरा कर पुनः मेष राशि में प्रवेश करते हैं, तब वे अपने ऊर्जावान घोड़ों को वापस रथ में जोत लेते हैं और पुनः अपनी तीव्र गति प्राप्त करते हैं।
|| मीन संक्रान्ति का धार्मिक महत्व ||
- पुण्य काल – मीन संक्रान्ति के दिन पवित्र नदियों में स्नान और दान का विशेष महत्व है। माना जाता है कि इस दिन किया गया दान अक्षय फल देता है।
- शुभ कार्यों पर रोक – चूंकि सूर्य की गति मंद होती है और वे गुरु की राशि में होते हैं, इसलिए इस काल को मांगलिक कार्यों (विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश) के लिए शुभ नहीं माना जाता।
- गुरु-शिष्य संबंध – ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सूर्य (शिष्य) जब अपने गुरु (बृहस्पति) की राशि में जाते हैं, तो वे सेवा भाव में रहते हैं, इसलिए सांसारिक सुखों के बजाय यह समय आध्यात्मिक उन्नति, जप और तप के लिए श्रेष्ठ है।
|| पूजा विधि एवं दान ||
- अर्घ्य – सूर्योदय के समय तांबे के लोटे में जल, लाल चंदन और फूल डालकर भगवान सूर्य को अर्घ्य दें।
- मंत्र – “ॐ घृणि सूर्याय नमः” का जाप करें।
- दान – इस दिन अन्न, पीले वस्त्र और गुड़ का दान करना अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है।
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