स्वारोचिष मन्वंतर की कथा मार्कण्डेय पुराण में विस्तार से वर्णित है। यह कथा द्वितीय मनु, स्वारोचिष के जन्म और उनके शासन की है। यहाँ इस कथा का सार दिया गया है:
|| स्वारोचिष मनु की उत्पत्ति की कथा ||
कथा की शुरुआत प्रवर नामक एक परम तेजस्वी ब्राह्मण से होती है। वे अपनी तपस्या और सत्यनिष्ठा के लिए प्रसिद्ध थे। एक बार एक हिमालयी औषधि के प्रभाव से वे अनजाने में हिमालय के अत्यंत सुंदर प्रदेश में पहुँच गए। वहाँ उनकी भेंट वरूथिनी नामक एक अप्सरा से हुई।
वरूथिनी प्रवर के रूप पर मोहित हो गई और उनसे प्रेम का प्रस्ताव रखा। किंतु प्रवर एक निष्ठवान ब्राह्मण थे, उन्होंने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया और अपने घर लौट आए।
वरूथिनी प्रवर के विरह में व्याकुल रहने लगी। कलि नामक एक गंधर्व, जो स्वयं वरूथिनी को चाहता था, ने प्रवर का रूप धारण किया और वरूथिनी के पास गया। वरूथिनी ने उसे ही वास्तविक ‘प्रवर’ समझ लिया। उन दोनों के संयोग से एक अत्यंत तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम स्वरोचि रखा गया।
स्वरोचि बड़ा होकर धनुर्विद्या और शास्त्रों में निपुण हुआ। एक बार वन विहार के समय उनकी भेंट तीन देवियों (मनोरमा, विभावरी और कलावती) से हुई जो शापग्रस्त थीं। स्वरोचि ने उन्हें शापमुक्त किया और उनसे विवाह किया।
स्वरोचि के यहाँ विजय नामक पुत्र हुआ। स्वरोचि ने बहुत समय तक सुखपूर्वक जीवन व्यतीत किया, लेकिन अंत में उन्हें वैराग्य हो गया और वे अपनी पत्नियों के साथ तपस्या करने चले गए।
स्वरोचि और उनकी पत्नी से एक पुत्र उत्पन्न हुआ जो सूर्य के समान तेजस्वी था। चूँकि वह स्वरोचि का पुत्र था, इसलिए उसका नाम स्वारोचिष पड़ा।
भगवान विष्णु की कृपा और अपनी तपस्या के बल पर स्वारोचिष को द्वितीय मन्वंतर का अधिपत्य प्राप्त हुआ। वे ही स्वारोचिष मनु कहलाए।
|| स्वारोचिष मन्वंतर का विवरण ||
स्वारोचिष मन्वंतर के दौरान सृष्टि की व्यवस्था कुछ इस प्रकार थी:
- मनु – स्वारोचिष।
- सप्तर्षि – ऊर्ज, स्तम्भ, प्राण, दत्तोली, ऋषभ, निश्चर और अर्वरीवत।
- देवता – पारावत और तुषित नामक देवगण।
- इंद्र – इस मन्वंतर के इंद्र का नाम रोचन था।
- भगवान का अवतार – इस काल में भगवान विष्णु ने विभु के रूप में अवतार लिया था।
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