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पशुपति व्रत कथा एवं पूजा विधि

Pashupatinath Vrat Katha and Pooja Vidhi Hindi

ShivaVrat Katha (व्रत कथा संग्रह)हिन्दी
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यह श्री पशुपतिनाथ व्रत (Pashupati Vrat PDF) की संपूर्ण कथा और विधि है। यह व्रत भगवान शिव को समर्पित है और मान्यता है कि इसे पूर्ण श्रद्धा से करने पर बड़ी से बड़ी मनोकामना पूर्ण होती है। पशुपति व्रत भगवान शिव (पशुपतिनाथ) को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। यह व्रत किसी भी सोमवार से शुरू किया जा सकता है (शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष)। यह व्रत केवल 5 सोमवार तक ही किया जाता है।

|| पशुपति व्रत कथा (Pashupati Vrat Katha PDF) ||

एक समय की बात है, एक गाँव में एक महिला रहती थी। उसका परिवार बहुत सुखी था, लेकिन अचानक उसके पति का व्यापार पूरी तरह से ठप हो गया। घर में दरिद्रता आ गई और पति की मानसिक स्थिति भी खराब हो गई। वह दिन-रात चिंता में डूबी रहती थी।

एक दिन वह महिला अपने गाँव के शिव मंदिर में गई। वहां उसने देखा कि एक बुजुर्ग माताजी भगवान शिव की भक्ति में लीन थीं। पूजा समाप्त होने के बाद, उस बुजुर्ग महिला ने उदास बैठी महिला से उसकी परेशानी का कारण पूछा।

उस महिला ने रोते हुए अपनी सारी व्यथा सुनाई कि कैसे उसका सुखी परिवार बिखर गया है और आर्थिक तंगी ने घेर लिया है।

तब बुजुर्ग माताजी ने उसे ढाढस बंधाया और कहा, “बेटी! तुम चिंता मत करो। भगवान शिव ‘भोलेनाथ’ हैं, वे अपने भक्तों का दुख नहीं देख सकते। तुम ‘पशुपति व्रत’ करो। यह व्रत 5 सोमवार किया जाता है और इससे हर मनोकामना पूर्ण होती है।”

महिला ने विधि पूछी, तो माताजी ने उसे व्रत के नियम समझाए। अगले सोमवार से ही उस महिला ने पूर्ण श्रद्धा के साथ पशुपति व्रत शुरू किया। वह सुबह जल्दी उठी, स्नान करके पूजा की थाली सजाई और मंदिर गई। शाम को उसी थाली में 6 घी के दीये और मीठा प्रसाद बनाकर ले गई। उसने नियम अनुसार पूजा की और घर आकर भोजन से पहले प्रसाद ग्रहण किया। ऐसा उसने लगातार 5 सोमवार तक किया। 5वें सोमवार को उसने नारियल फोड़कर व्रत का उद्यापन (समापन) किया।

चमत्कार यह हुआ कि 5 सोमवार पूरे होते-होते उसके पति का स्वास्थ्य सुधरने लगा और बंद पड़ा व्यापार फिर से चल पड़ा। घर में फिर से खुशहाली और धन-धान्य की वापसी हुई।

कुछ समय बाद, उस महिला की एक सखी उससे मिलने आई। उसने देखा कि उसका घर फिर से खुशहाल हो गया है। सखी ने पूछा, “बहन, यह सब कैसे ठीक हुआ?”

तब महिला ने उसे ‘पशुपति व्रत’ के बारे में बताया। सखी ने कहा, “मेरे भाई का विवाह नहीं हो रहा है, क्या मैं भी यह व्रत कर सकती हूँ?” महिला ने कहा, “हाँ, यह व्रत कोई भी कर सकता है।”

सखी ने भी 5 सोमवार तक पशुपति व्रत किया और उद्यापन किया। कुछ ही दिनों में उसके भाई का रिश्ता पक्का हो गया और धूम-धाम से विवाह संपन्न हुआ।

इस प्रकार जो भी व्यक्ति सच्चे मन और सही विधि से भगवान पशुपतिनाथ का यह व्रत करता है, भोलेनाथ उसकी झोली खुशियों से भर देते हैं।

|| पशुपति व्रत की पूजा विधि (नियम) ||

यह व्रत बहुत ही नियमबद्ध तरीके से किया जाता है। कृपया इसे ध्यान से पढ़ें:

  • सोमवार की सुबह – सुबह स्नान करके पूजा की थाली तैयार करें। शिव मंदिर जाएं और भगवान शिव का अभिषेक करें (जल, दूध, बेलपत्र आदि चढ़ाएं)। जिस थाली को आप सुबह ले गए हैं, उसे धोएं नहीं। उसी थाली को शाम की पूजा के लिए रखें।
  • सोमवार की शाम (प्रदोष काल) – शाम को उसी थाली में 6 घी के दीये और कुछ मीठा प्रसाद (हलवा, खीर या मिठाई) रखें। उसी मंदिर में जाएं जहां सुबह गए थे। भगवान शिव के सामने 5 दीये जलाएं। छठा दीया जलाएं नहीं, उसे बिना जलाए वापस थाली में रख लें। प्रसाद के तीन हिस्से करें। दो हिस्से भगवान शिव के पास रख दें और एक हिस्सा अपनी थाली में वापस रख लें।
  • घर आने पर – घर में प्रवेश करने से पहले, मुख्य द्वार (Main Gate) के दाहिनी ओर (Right Side) वह छठा दीया (जो मंदिर से बिना जलाए लाए थे) जलाएं और अपनी मनोकामना बोलें। घर के अंदर जाकर भोजन करते समय, सबसे पहले वह एक हिस्सा प्रसाद खाएं जो आप मंदिर से लाए थे। उसके बाद ही भोजन करें। (प्रसाद में किसी और को हिस्सा न दें)।

|| उद्यापन विधि (5वें सोमवार को) ||

पांचवें सोमवार को भी पूजा की विधि वही रहेगी (सुबह और शाम की)। बस शाम को कुछ अतिरिक्त करना है:

  • शाम की पूजा में एक नारियल (श्रीफल) लें। उस पर कलावा (मौली) लपेटें और 11 रुपए (या श्रद्धा अनुसार) रखकर भगवान शिव को अर्पित करें।
  • हाथ जोड़कर प्रार्थना करें कि “हे भोलेनाथ! मैंने अपनी मनोकामना पूर्ति हेतु यह पशुपति व्रत किया है, कृपया इसे स्वीकार करें।”

।। ॐ नमः शिवाय ।।

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