माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी कहा जाता है, जो वर्ष 2026 में 14 जनवरी को मनाई जाएगी। इस पावन तिथि का हिंदू धर्म में विशेष आध्यात्मिक महत्व है क्योंकि यह दिन भगवान विष्णु की आराधना और दान-पुण्य के लिए समर्पित है।
इस एकादशी के नाम में ही इसका सार छिपा है – ‘षट’ यानी छह और ‘तिला’ यानी तिल। इस दिन तिल का छह प्रकार से उपयोग (स्नान, उबटन, तर्पण, आहुति, भोजन और दान) अत्यंत फलदायी माना गया है। मान्यता है कि जो भक्त इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखते हैं और तिल का दान करते हैं, उन्हें जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति मिलती है और अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
- तिथि – 14 जनवरी 2026 (बुधवार)
- पारण का समय – 15 जनवरी को सुबह 07:14 से 09:22 के बीच।
- विशेष संयोग – इस वर्ष षटतिला एकादशी और मकर संक्रांति एक ही दिन पड़ रहे हैं, जिससे इस दिन का महत्व कई गुना बढ़ गया है।
॥ षटतिला एकादशी व्रत पूजा विधि ॥
- षटतिला एकादशी व्रत में भगवान विष्णु की पूजा की जाती है।
- इस दिन तिल का प्रयोग 6 तरीकों से किया जाता है। तिल स्नान, तिल का उबटन, तिल का हवन, तिल का तर्पण, तिल का भोग और तिल का दान।
- पूजा के लिए इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में जागकर स्नान कर लें।
- उसके बाद भगवान विष्णु की पूजा प्रारंभ करें। पूरे दिन निराहार व्रत रखें। फलों का सेवन किया जा सकता है।
- शाम के समय भगवान विष्णु का पूजन कर उन्हें तिल का भोग लगाएं और षटतिला एकादशी की व्रत कथा भी जरूर पढ़ें।
- भगवान विष्णु की प्रिय तुसली के समीप दीपक जलाएं।
- अगले दिन सूर्योदय के बाद व्रत का पारण करें।
॥ षटतिला एकादशी व्रत कथा (Shattila Ekadashi Vrat Katha PDF) ॥
प्राचीनकाल में मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह सदैव व्रत किया करती थी। एक समय वह एक मास तक व्रत करती रही। इससे उसका शरीर अत्यंत दुर्बल हो गया। यद्यपि वह अत्यंत बुद्धिमान थी तथापि उसने कभी देवताअओं या ब्राह्मणों के निमित्त अन्न या धन का दान नहीं किया था। इससे मैंने सोचा कि ब्राह्मणी ने व्रत आदि से अपना शरीर शुद्ध कर लिया है, अब इसे विष्णुलोक तो मिल ही जाएगा परंतु इसने कभी अन्न का दान नहीं किया, इससे इसकी तृप्ति होना कठिन है।
भगवान ने आगे कहा- ऐसा सोचकर मैं भिखारी के वेश में मृत्युलोक में उस ब्राह्मणी के पास गया और उससे भिक्षा माँगी। वह ब्राह्मणी बोली- महाराज किसलिए आए हो? मैंने कहा- मुझे भिक्षा चाहिए। इस पर उसने एक मिट्टी का ढेला मेरे भिक्षापात्र में डाल दिया। मैं उसे लेकर स्वर्ग में लौट आया। कुछ समय बाद ब्राह्मणी भी शरीर त्याग कर स्वर्ग में आ गई। उस ब्राह्मणी को मिट्टी का दान करने से स्वर्ग में सुंदर महल मिला, परंतु उसने अपने घर को अन्नादि सब सामग्रियों से शून्य पाया।
घबराकर वह मेरे पास आई और कहने लगी कि भगवन् मैंने अनेक व्रत आदि से आपकी पूजा की परंतु फिर भी मेरा घर अन्नादि सब वस्तुओं से शून्य है। इसका क्या कारण है? इस पर मैंने कहा- पहले तुम अपने घर जाओ। देवस्त्रियाँ आएँगी तुम्हें देखने के लिए। पहले उनसे षटतिला एकादशी का पुण्य और विधि सुन लो, तब द्वार खोलना। मेरे ऐसे वचन सुनकर वह अपने घर गई। जब देवस्त्रियाँ आईं और द्वार खोलने को कहा तो ब्राह्मणी बोली- आप मुझे देखने आई हैं तो षटतिला एकादशी का माहात्म्य मुझसे कहो।
उनमें से एक देवस्त्री कहने लगी कि मैं कहती हूँ। जब ब्राह्मणी ने षटतिला एकादशी का माहात्म्य सुना तब द्वार खोल दिया। देवांगनाओं ने उसको देखा कि न तो वह गांधर्वी है और न आसुरी है वरन पहले जैसी मानुषी है। उस ब्राह्मणी ने उनके कथनानुसार षटतिला एकादशी का व्रत किया। इसके प्रभाव से वह सुंदर और रूपवती हो गई तथा उसका घर अन्नादि समस्त सामग्रियों से युक्त हो गया।
अत: मनुष्यों को मूर्खता त्यागकर षटतिला एकादशी का व्रत और लोभ न करके तिलादि का दान करना चाहिए। इससे दुर्भाग्य, दरिद्रता तथा अनेक प्रकार के कष्ट दूर होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
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