फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी, जिसे हम आमलकी एकादशी के नाम से जानते हैं, हिंदू धर्म में एक विशेष स्थान रखती है। होली के रंगों में सराबोर होने से ठीक पहले आने वाली यह एकादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शुद्धिकरण का एक महापर्व है। इसे ‘रंगभरी एकादशी’ भी कहा जाता है, क्योंकि मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव माता पार्वती का गौना कराकर पहली बार काशी आए थे।
लेकिन आखिर इसे ‘मोक्षदायिनी’ क्यों कहा जाता है? आइए, इसके पीछे छिपे उन गूढ़ रहस्यों और पौराणिक कथाओं को समझते हैं जो इसे अन्य एकादशियों से अलग बनाती हैं।
‘आमलकी’ का गहरा अर्थ और उत्पत्ति का रहस्य
‘आमलकी’ शब्द का अर्थ है आंवला। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए, तब उनके नेत्रों से प्रेम के प्रेमाश्रु गिरे थे। इन्हीं आंसुओं से ‘आंवले’ के वृक्ष की उत्पत्ति हुई।
- देवताओं का वास – शास्त्रों के अनुसार, आंवले के वृक्ष के हर हिस्से में देवताओं का वास होता है। इसके मूल (जड़) में विष्णु, ऊपर ब्रह्मा, तने में शिव और शाखाओं में ऋषियों का निवास माना गया है।
- आयुर्वेद और अध्यात्म का मेल – जहाँ आयुर्वेद में आंवला कायाकल्प करने वाला फल है, वहीं अध्यात्म में इसे जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाने वाला प्रतीक माना गया है।
इसे ‘मोक्षदायिनी’ क्यों माना जाता है?
आमलकी एकादशी को लेकर पद्म पुराण में एक अत्यंत रोचक कथा है। प्राचीन काल में चैत्ररथ नामक एक राजा थे। उनके राज्य में सभी लोग एकादशी का व्रत करते थे। एक बार आमलकी एकादशी के दिन राजा और प्रजा मंदिर में जागरण कर रहे थे, तभी वहां एक शिकारी (बहेलिया) आया जो अत्यंत भूखा और पापी था।
उसने रात भर जागकर भगवान की कथा सुनी और विष्णु प्रतिमा के दर्शन किए। अनजाने में ही सही, लेकिन उसने एकादशी व्रत और जागरण के नियमों का पालन कर लिया। परिणामस्वरुप, अगले जन्म में वह एक प्रतापी राजा बना और अंत में उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई।
मुख्य रहस्य – यह एकादशी सिखाती है कि यदि अनजाने में किया गया सत्संग और व्रत इतना फलदायी हो सकता है, तो पूर्ण श्रद्धा से किया गया व्रत मनुष्य के समस्त संचित पापों को भस्म कर उसे वैकुंठ धाम (मोक्ष) की ओर ले जाता है।
होली और आमलकी एकादशी का संबंध
होली उमंग और उल्लास का त्योहार है, लेकिन हिंदू दर्शन के अनुसार, किसी भी उत्सव की शुरुआत शुद्धिकरण से होनी चाहिए।
- यह एकादशी होली से 4 दिन पहले आती है।
- यह मन को विकारों (काम, क्रोध, लोभ) से मुक्त करने का अवसर देती है ताकि हम स्वच्छ मन से होली के पवित्र रंगों का स्वागत कर सकें।
- वाराणसी में इसी दिन से ‘होली’ की आधिकारिक शुरुआत मानी जाती है, जहाँ बाबा विश्वनाथ को गुलाल अर्पित किया जाता है।
पूजा विधि और विशेष नियम
यदि आप इस दिन मोक्ष और आरोग्य की कामना रखते हैं, तो इन चरणों का पालन करें:
- आंवले के वृक्ष की पूजा – इस दिन मुख्य रूप से आंवले के पेड़ के नीचे बैठकर भगवान विष्णु की पूजा की जाती है।
- अर्पण – भगवान को आंवले का फल और धूप-दीप अर्पित करें।
- परिक्रमा – वृक्ष की ७ या २१ बार परिक्रमा करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
- दान का महत्व – इस दिन आंवले का दान करना स्वर्ण दान के समान फलदायी बताया गया है।
Found a Mistake or Error? Report it Now

