हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है, लेकिन फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली आमलकी एकादशी (Amalaki Ekadashi) अपनी महिमा के कारण बेहद खास मानी जाती है। इसे ‘रंगभरी एकादशी’ के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के साथ-साथ आंवले के वृक्ष की पूजा का विधान है।
शास्त्रों के अनुसार, आमलकी एकादशी का व्रत करने से न केवल समस्त पापों का नाश होता है, बल्कि व्यक्ति को जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिलकर मोक्ष (बैकुंठ धाम) की प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं इस पावन व्रत की वह पौराणिक कथा, जिसने एक क्रूर शिकारी का जीवन बदल दिया।
आमलकी एकादशी का महत्व और आंवले का रहस्य
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा जी को उत्पन्न किया, उसी समय उन्होंने आंवले के वृक्ष को भी जन्म दिया। भगवान विष्णु ने स्वयं कहा है कि आंवले का वृक्ष उन्हें अत्यंत प्रिय है और इसमें साक्षात लक्ष्मी जी व सभी देवताओं का वास होता है। इसीलिए इस दिन आंवले का सेवन और पूजन अक्षय पुण्य प्रदान करता है।
आमलकी एकादशी पौराणिक व्रत कथा – राजा चित्रसेन और वैदिश नगर
प्राचीन काल में ‘वैदिश’ नाम का एक नगर था, जहाँ के राजा चित्रसेन बहुत ही धार्मिक और न्यायप्रिय थे। उनके राज्य में प्रजा सुखी थी और सभी नगरवासी एकादशी का व्रत पूरी निष्ठा से करते थे।
एक बार फाल्गुन शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी आई। राजा और उनकी प्रजा ने मंदिर के पास स्थित आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर भगवान विष्णु की स्तुति की और रात भर जागरण किया।
उसी समय एक भूखा-प्यासा शिकारी, जो वन्य जीवों की हत्या कर अपना पेट पालता था, वहां आ पहुँचा। वह मंदिर के कोने में छिपकर देखने लगा कि वहां क्या हो रहा है। उसने देखा कि लोग भक्ति भाव से भगवान की कथा सुन रहे हैं और दीपदान कर रहे हैं।
शिकारी पूरी रात जागता रहा और अनजाने में ही उसने आमलकी एकादशी का जागरण और व्रत कर लिया। सुबह होने पर शिकारी अपने घर चला गया और कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो गई।
अपने पूर्व जन्म में अनजाने में किए गए एकादशी व्रत के प्रभाव से उस शिकारी का अगला जन्म एक प्रतापी राजा के घर हुआ। उसका नाम वसूरथ रखा गया। वह अत्यंत बलवान, धार्मिक और दानवीर राजा बना।
एक बार राजा वसूरथ जंगल में शिकार खेलते समय रास्ता भटक गए और एक घने जंगल में सो गए। तभी वहां कुछ डाकुओं ने उन पर हमला कर दिया। डाकुओं ने जैसे ही राजा पर अस्त्र-शस्त्र चलाए, वे शस्त्र फूलों में बदल गए। अचानक राजा के शरीर से एक दिव्य देवी प्रकट हुईं, जिन्होंने सभी डाकुओं का संहार कर दिया।
जब राजा की आंख खुली, तो उन्होंने देखा कि उनके शत्रु मृत पड़े हैं। तब आकाशवाणी हुई – “हे राजन! यह सब तुम्हारी पूर्व जन्म की आमलकी एकादशी के व्रत का प्रभाव है। तुमने अनजाने में ही सही, लेकिन उस व्रत का पालन किया था, जिसके पुण्य ने आज तुम्हारी रक्षा की।”
राजा वसूरथ को अपनी वास्तविकता का बोध हुआ और वे आजीवन एकादशी का व्रत करने लगे। अंत में उन्हें भगवान विष्णु के परम पद यानी बैकुंठ धाम की प्राप्ति हुई।
आमलकी एकादशी व्रत के लाभ
- पापों से मुक्ति – जाने-अनजाने में किए गए पापों का प्रायश्चित होता है।
- मोक्ष की प्राप्ति – कठिन तपस्या के समान फल मिलता है।
- आरोग्य वरदान – आंवले का पूजन और सेवन स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना गया है।
आमलकी एकादशी – कैसे करें पूजन?
- सुबह स्नान कर भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें।
- किसी उद्याय या मंदिर में आंवले के वृक्ष की जड़ में जल अर्पित करें।
- वृक्ष की धूप, दीप और गंध से पूजा करें।
- ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करें।
- अगले दिन (द्वादशी को) किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को दान देकर व्रत का पारण करें।
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