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भगवान गणेश के 32 स्वरूपों में से एक ‘द्विजप्रिय’ की महिमा और संकष्टी व्रत के लाभ

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भगवान गणेश की महिमा अनंत है। हम उन्हें विघ्नहर्ता कहते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि शास्त्रों (विशेषकर मुद्गल पुराण) में उनके 32 विशिष्ट स्वरूपों का वर्णन मिलता है? इनमें से हर स्वरूप जीवन की एक अलग समस्या का समाधान करता है। आज हम चर्चा करेंगे भगवान गणेश के छठे स्वरूप – ‘द्विजप्रिय’ (Dwijapriya Ganesha) की।

यह स्वरूप न केवल ज्ञान का प्रतीक है, बल्कि द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के दिन इनकी पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में आध्यात्मिक और भौतिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। जब जीवन में अनिश्चितता का दौर आता है, तो हम अक्सर शक्ति की तलाश करते हैं। ‘द्विजप्रिय’ गणेश वही शक्ति हैं जो बुद्धि को स्थिरता और जीवन को ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। आइए, इस लेख में उनके इस अद्भुत स्वरूप की गहराई को समझते हैं।

कौन हैं ‘द्विजप्रिय’ गणेश?

‘द्विजप्रिय’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है: ‘द्विज’ (जिसका अर्थ है दो बार जन्मा हुआ, जैसे ब्राह्मण या वे व्यक्ति जिनका उपनयन संस्कार हुआ हो) और ‘प्रिय’ (जिन्हें वे प्रिय हैं)।

स्वरूप की विशेषताएं

  • चार मुख (Four Faces) – द्विजप्रिय गणेश के चार मुख हैं, जो चारों वेदों और सभी दिशाओं में उनके ज्ञान के प्रसार का प्रतीक हैं।
  • शुभ्र वर्ण – इनका रंग चंद्रमा के समान सफेद या सुनहरा माना जाता है, जो शांति और सात्विकता को दर्शाता है।
  • चार भुजाएं – उनकी चार भुजाओं में विशिष्ट आयुध (औजार) हैं:
  • अक्षमाला (माला) – निरंतर साधना और मंत्र जाप का प्रतीक।
  • कमंडल (जल पात्र) – शुद्धि और आध्यात्मिक ऊर्जा का स्रोत।
  • दण्ड (छड़ी) – अनुशासन और आत्म-नियंत्रण का प्रतीक।
  • पुस्तक (ग्रंथ) – असीमित ज्ञान और बुद्धिमत्ता का प्रतीक।

द्विजप्रिय स्वरूप का आध्यात्मिक महत्व

द्विजप्रिय गणेश की उपासना विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जो ‘पुनर्जन्म’ या जीवन में एक ‘नई शुरुआत’ करना चाहते हैं। यहाँ ‘द्विज’ होने का अर्थ केवल जाति से नहीं, बल्कि संस्कारों से पुनः जन्म लेने से है।

  • बुद्धि का विकास – यदि आप महसूस करते हैं कि आपके निर्णय गलत हो रहे हैं, तो द्विजप्रिय रूप का ध्यान करने से विवेक जाग्रत होता है।
  • अनुशासन की शक्ति – उनके हाथ में ‘दण्ड’ इस बात का संकेत है कि जीवन में सफलता बिना अनुशासन के संभव नहीं है।

संकष्टी चतुर्थी व्रत और द्विजप्रिय गणेश का संबंध

हर महीने की चतुर्थी को ‘संकष्टी’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है ‘संकटों को हरने वाली’। जब संकष्टी व्रत में द्विजप्रिय गणेश का आह्वान किया जाता है, तो इसके लाभ कई गुना बढ़ जाते हैं।

संकष्टी व्रत के मुख्य लाभ

  • चंद्रमा के दर्शन और अर्घ्य के साथ यह व्रत खत्म होता है, जिससे मन का कारक ‘चंद्रमा’ मजबूत होता है और तनाव (Stress) कम होता है।
  • द्विजप्रिय गणेश ऐश्वर्य के भी देवता हैं। नियमित रूप से यह व्रत करने से आर्थिक बाधाएं दूर होती हैं।
  • छात्रों के लिए द्विजप्रिय स्वरूप की पूजा किसी वरदान से कम नहीं है, क्योंकि वे साक्षात ज्ञान के देवता हैं।

कैसे करें द्विजप्रिय गणेश का पूजन?

अगर आप इस संकष्टी पर भगवान के इस स्वरूप की कृपा पाना चाहते हैं, तो इन चरणों का पालन करें:

  • द्विजप्रिय गणेश को पीला और शुभ्र (सफेद) रंग अत्यंत प्रिय है। पूजा में पीले फूलों और पीले चंदन का प्रयोग करें।
  • इन्हें मोदक के साथ-साथ दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगाना श्रेष्ठ माना जाता है।
  • पूजा के दौरान इस मंत्र का उच्चारण करें: “पासंकुसादिचक्रद्यकरैराबिभ्रतं मुदा। द्विजप्रियं च चतुर्वक्त्रं भजेद्गणपतिं सदा॥” (मैं उन चार मुख वाले द्विजप्रिय गणपति की वंदना करता हूँ, जो अपने हाथों में पाश, अंकुश और ज्ञान के प्रतीक धारण करते हैं।)

क्यों जरूरी है आज के समय में यह पूजा?

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम ‘बुद्धि’ तो बहुत इस्तेमाल करते हैं, लेकिन ‘विवेक’ भूल जाते हैं। द्विजप्रिय गणेश हमें सिखाते हैं कि सच्चा ‘द्विज’ वही है जो शिक्षित होने के साथ-साथ संस्कारित भी हो।

संकष्टी का उपवास हमें धैर्य (Patience) सिखाता है। पूरे दिन भूखा रहकर रात में चांद का इंतजार करना हमें यह बताता है कि जीवन में अच्छे परिणाम के लिए प्रतीक्षा और तपस्या अनिवार्य है।

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