वाराणसी, जिसे काशी और बनारस के नाम से भी जाना जाता है, केवल एक शहर नहीं, बल्कि जीवित इतिहास है। यहाँ की हर गली, हर घाट और हर मंदिर हज़ारों साल पुरानी कहानियाँ सुनाता है। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर इस धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का केंद्र बिंदु है, लेकिन इसके आसपास कई ऐसे ऐतिहासिक और आध्यात्मिक स्थल हैं, जहाँ की यात्रा आपकी काशी यात्रा को संपूर्ण बना देगी। आइये, काशी विश्वनाथ मंदिर के पास स्थित 5 ऐसे ही ऐतिहासिक स्थानों और उनके मनमोहक इतिहास पर गहराई से नज़र डालते हैं।
दशाश्वमेध घाट – जहाँ ब्रह्मा ने किए थे 10 घोड़ों के यज्ञ
दशाश्वमेध घाट काशी का सबसे जीवंत और प्रसिद्ध घाट है, जो काशी विश्वनाथ मंदिर से पैदल दूरी पर स्थित है।
- पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस घाट पर स्वयं भगवान ब्रह्मा ने शिवजी का स्वागत करने के लिए दस अश्वमेध यज्ञ (10 घोड़ों की बलि) किए थे, जिसके कारण इसका नाम ‘दशाश्वमेध’ पड़ा। यह घाट सदियों से पवित्र अनुष्ठानों और धार्मिक गतिविधियों का केंद्र रहा है।
- यहाँ की संध्याकालीन गंगा आरती विश्व प्रसिद्ध है। यह एक अद्भुत दृश्य होता है जब मंत्रों, घंटियों और असंख्य दीपकों की लौ से पूरा घाट जगमगा उठता है। आरती का यह भव्य नज़ारा यहाँ की प्राचीन संस्कृति और अटूट आस्था को दर्शाता है।
मणिकर्णिका घाट – मुक्ति का द्वार
मणिकर्णिका घाट सिर्फ एक घाट नहीं, बल्कि हिंदू धर्म में जीवन और मृत्यु के चक्र का प्रतीक है। यह काशी विश्वनाथ मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित है।
- हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह वह स्थान है जहाँ भगवान शिव ने तांडव करते समय देवी सती के कान की बाली (मणिकर्णिका) गिरा दी थी। एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने सृष्टि की रचना से पहले यहाँ तपस्या के दौरान एक कुंड खोदा था। यह घाट मोक्ष (मुक्ति) की अवधारणा के लिए जाना जाता है; माना जाता है कि यहाँ अंतिम संस्कार करने से आत्मा को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिल जाती है।
- यह घाट जीवन की क्षणभंगुरता और आध्यात्मिक गहनता को समझने का एक अनूठा अवसर प्रदान करता है। यहाँ दिन-रात चिताएँ जलती रहती हैं, जो काशी को “मुक्ति का शहर” बनाती हैं।
माँ अन्नपूर्णा मंदिर – अन्न की देवी का वास
काशी विश्वनाथ मंदिर के ठीक पास स्थित, माँ अन्नपूर्णा का यह मंदिर भक्तों के लिए भोजन और समृद्धि का प्रतीक है।
- यह मंदिर देवी अन्नपूर्णा को समर्पित है, जिन्हें भोजन और पोषण की देवी माना जाता है। किंवदंतियों के अनुसार, एक बार काशी में अकाल पड़ा था, तब स्वयं शिव ने देवी अन्नपूर्णा से भिक्षा माँगी थी। देवी ने वरदान दिया कि काशी में कोई भूखा नहीं रहेगा।
- हर साल, धनतेरस के अवसर पर, देवी अन्नपूर्णा के दर्शन करने वाले भक्तों को प्रसाद के रूप में धान की खील और सिक्के दिए जाते हैं। यह प्रसाद घर में धन और अन्न की कमी न होने का प्रतीक माना जाता है।
ज्ञानवापी कूप (ज्ञानवापी कुआँ) – शाश्वत ज्ञान का स्रोत
ज्ञानवापी कूप काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के पास स्थित एक अत्यधिक पूजनीय कुआँ है।
- ‘ज्ञानवापी’ का अर्थ है ‘ज्ञान का कुआँ’। ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव ने स्वयं इस कुएँ को अपने त्रिशूल से खोदा था और इसमें से जो जल निकला वह ज्ञान का स्रोत था। काशी विश्वनाथ मंदिर के कई बार टूटने और बनने के दौरान, शिवलिंग को मुगलों से बचाने के लिए पुजारियों द्वारा इसी कुएँ में छिपा दिया गया था।
- इस कुएँ के जल को अत्यंत पवित्र माना जाता है, और भक्त मानते हैं कि यह आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करता है। यद्यपि वर्तमान में सुरक्षा कारणों से यहाँ से जल लेना संभव नहीं है, लेकिन इसकी उपस्थिति ही इसके गहरे इतिहास को बताती है।
काल भैरव मंदिर – काशी के कोतवाल
काल भैरव मंदिर, जो शहर के कोतवाल (संरक्षक) को समर्पित है, काशी विश्वनाथ मंदिर से थोड़ी दूरी पर स्थित है, लेकिन काशी यात्रा के लिए अत्यंत आवश्यक माना जाता है।
- भगवान काल भैरव को शिव का उग्र रूप और वाराणसी का ‘कोतवाल’ (न्यायिक अधिकारी) माना जाता है। यह माना जाता है कि काशी में रहने वाले हर व्यक्ति को, यहाँ तक कि भगवान शिव को भी, इस कोतवाल से अनुमति लेनी पड़ती है। यहाँ के दर्शन के बिना काशी यात्रा अपूर्ण मानी जाती है।
- भक्त मानते हैं कि काल भैरव की पूजा करने से सभी प्रकार के कष्टों और भय से मुक्ति मिलती है। यह मंदिर अपनी प्राचीन और थोड़ी डरावनी मूर्तियों के लिए भी प्रसिद्ध है, जो शिव के इस प्रचंड रूप को दर्शाती हैं।
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