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पिशाच योनी से मुक्ति दिलाने वाली ‘जया एकादशी’ का रहस्य और इसके पीछे की प्राचीन कहानी।

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हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है, लेकिन माघ मास के शुक्ल पक्ष की ‘या एकादशी’ अपने आप में अत्यंत विलक्षण और कल्याणकारी मानी गई है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह केवल एक व्रत नहीं बल्कि वह अमोघ अस्त्र है जो मनुष्य को नीच योनियों, विशेषकर पिशाच योनी के कष्टों से मुक्ति दिलाता है। आइए, विस्तार से जानते हैं जया एकादशी का रहस्य, इसकी पौराणिक कथा और इसके आध्यात्मिक लाभ।

शास्त्रों में वर्णित है कि जाने-अनजाने में किए गए पाप कर्मों के कारण कई बार जीवात्मा को मृत्यु के पश्चात ‘पिशाच’ (Preta/Ghost) योनी में भटकना पड़ता है। जया एकादशी का व्रत उस अंधकारमय जीवन से प्रकाश की ओर ले जाने वाली सीढ़ी है। 2026 में यह तिथि आध्यात्मिक उन्नति के इच्छुक जातकों के लिए विशेष फलदायी है।

जया एकादशी की प्राचीन कथा (पुष्पवान और माल्यवान का प्रसंग)

पद्म पुराण के अनुसार, एक समय इंद्र की सभा में माल्यवान नामक गंधर्व और पुष्पवती नामक अप्सरा का नृत्य-गायन चल रहा था। कामदेव के प्रभाववश दोनों एक-दूसरे पर मोहित हो गए और गायन की मर्यादा को भूल गए। उनकी सुर-ताल बिगड़ गई और सभा का अनुशासन भंग हो गया।

इंद्र ने इसे अपना अपमान समझा और क्रोधवश उन्हें श्राप दे दिया – “तुम दोनों पति-पत्नी के रूप में मृत्युलोक (पृथ्वी) पर जाकर पिशाच योनी प्राप्त करो और अपने कुकर्मों का फल भोगो।“

श्राप के प्रभाव से दोनों हिमालय की तराई में पिशाच बनकर रहने लगे। वहाँ का जीवन अत्यंत कष्टकारी था। न उन्हें नींद आती थी, न ही भोजन मिलता था। ठंड और भूख से व्याकुल होकर वे कराहते रहते थे।

संयोगवश, माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन दोनों ने अत्यंत दुःख के कारण कुछ भी नहीं खाया। वे केवल फल-फूल खाकर रहे और पूरी रात भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए जागते रहे। अनजाने में ही सही, लेकिन उन्होंने जया एकादशी का कठोर उपवास और रात्रि जागरण पूर्ण कर लिया।

अगले दिन सुबह होते ही उनके पिशाच शरीर का अंत हो गया और वे पुनः अपने दिव्य गंधर्व स्वरूप में आ गए। स्वर्ग लोक पहुंचने पर जब इंद्र ने उन्हें देखा तो वे चकित रह गए। माल्यवान ने बताया कि यह भगवान विष्णु की कृपा और जया एकादशी का प्रताप है। इंद्र अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें पुनः स्वर्ग में स्थान दिया।

जया एकादशी व्रत के नियम और पूजा विधि

इस व्रत का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए इसे विधि-विधान से करना अनिवार्य है:

  • दशमी तिथि की रात्रि से ही सात्विक भोजन ग्रहण करें और एकादशी के दिन प्रातः काल स्नान कर भगवान विष्णु (श्री कृष्ण) के सम्मुख व्रत का संकल्प लें।
  • भगवान को पीले पुष्प, चंदन, अक्षत और विशेष रूप से ‘धूप-दीप’ अर्पित करें।
  • ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का निरंतर मानसिक जाप करें।
  • एकादशी की रात को सोना नहीं चाहिए। भजन-कीर्तन के माध्यम से रात्रि जागरण करने से अनंत गुना फल मिलता है।
  • द्वादशी तिथि को ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को भोजन कराकर स्वयं व्रत खोलें।

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