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Kalashatmi 2026 List – वर्ष 2026 में कब-कब है कालाष्टमी? पूरी लिस्ट, पूजा विधि और पौराणिक महत्व

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वर्ष 2026 में कालाष्टमी का व्रत भगवान शिव के रौद्र रूप, भगवान काल भैरव को समर्पित है। यह प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। तांत्रिक और आध्यात्मिक दृष्टि से इस दिन का अत्यधिक महत्व है, क्योंकि काल भैरव को “समय का अधिपति” और “नकारात्मक ऊर्जा का विनाशक” माना जाता है। कालाष्टमी एक पवित्र हिंदू त्योहार है जो काल भैरव को समर्पित है।

कालाष्टमी के दिन भगवान शिव की भैरव रूप में पूजा की जाती है। वह समय के स्वामी हैं और समय को महत्व देने वाले को आशीर्वाद देते हैं। भगवान शिव (भोलेनाथ) के भैरव रूप के स्मरण से सभी प्रकार के पाप और कष्ट दूर हो जाते हैं। कालाष्टमी को ‘काला अष्टमी’ के नाम से भी जाना जाता है। हर महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कालाष्टमी भक्तों के बीच बड़ी भक्ति के साथ मनाई जाती है।

इस शुभ दिन पर, भगवान भैरव के भक्त उपवास रखते हैं और बड़े समर्पण के साथ उनकी पूजा करते हैं। सबसे मुख्य कालाष्टमी जिसे ‘कालभैरव जयन्ती’ के नाम से जाना जाता है, उत्तरी भारतीय पूर्णिमान्त पञ्चाङ्ग के अनुसार मार्गशीर्ष के महीने में पड़ती है जबकि दक्षिणी भारतीय अमान्त पञ्चाङ्ग के अनुसार कार्तिक के महीने में पड़ती है। हालाँकि दोनों पञ्चाङ्ग में कालभैरव जयन्ती एक ही दिन देखी जाती है। यह माना जाता है कि उसी दिन भगवान शिव भैरव के रूप में प्रकट हुए थे।

2026 कालाष्टमी व्रत की सूची

कालाष्टमी तिथि
माघ कालाष्टमी जनवरी 10, 2026, शनिवार
फाल्गुन कालाष्टमी फरवरी 9, 2026, सोमवार
चैत्र कालाष्टमी मार्च 11, 2026, बुधवार
वैशाख कालाष्टमी अप्रैल 10, 2026, शुक्रवार
ज्येष्ठ कालाष्टमी मई 9, 2026, शनिवार
ज्येष्ठ कालाष्टमी जून 8, 2026, सोमवार
आषाढ़ कालाष्टमी जुलाई 7, 2026, मंगलवार
श्रावण कालाष्टमी अगस्त 5, 2026, बुधवार
भाद्रपद कालाष्टमी सितम्बर 4, 2026, शुक्रवार
अश्विनी कालाष्टमी अक्टूबर 3, 2026, शनिवार
कार्तिक कालाष्टमी नवम्बर 1, 2026, रविवार
मार्गशीर्ष कालाष्टमी दिसम्बर 1, 2026, मंगलवार
पौष कालाष्टमी दिसम्बर 30, 2026, बुधवार

कालाष्टमी का महत्व

भगवान काल भैरव को शिव जी उग्र स्वरूप माना जाता है। इनकी पूजा से व्यक्ति को जीवन के सभी दुखों से छुटकारा मिलता है और घर में खुशियों का आगमन होता है। सामान्य लोगों को बाबा बटुक भैरव की पूजा करनी चाहिए, जो भैरवनाथ का सौम्य रूप है।

कालाष्टमी के दिन पूजा के समय काल भैरव को मीठी रोटी का भोग लगाना चाहिए। इस दिन कपूर, काले कपड़े, जूते, चप्पल, सरसों का तेल, और काजल का दान करना शुभ माना जाता है। कालभैरव की पूजा-अर्चना करने से नकारात्मक शक्तियाँ, शत्रु और सभी पापों से छुटकारा मिलता है। साथ ही मनोवांछित फल भी प्राप्त होता है।

अगर कोई ग्रह अशुभ प्रभाव दे रहा हो तो कालभैरव का व्रत करने से क्रूर ग्रहों का प्रभाव खत्म हो जाता है और शुभ फल देने लगते हैं। इनकी पूजा-पाठ से किसी भी प्रकार का जादू-टोना खत्म हो जाता है, भूत-प्रेत से मुक्ति मिलती है और भय भी खत्म हो जाता है, ऐसा माना जाता है।

लाल किताब में काल भैरव को शनि का अधिपति देव बताया गया है और उनकी पूजा से शनि दोष, राहु-केतु से प्राप्त हुई पीड़ा से मुक्ति मिलती है।

कालाष्टमी व्रत पूजा विधि

  • ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें।
  • लकड़ी के पाट पर भगवान शिव, माता पार्वती और कालभैरव की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।
  • चारों ओर गंगाजल छिड़कें और फूलों की माला या फूल अर्पित करें।
  • नारियल, इमरती, पान, मदिरा, गेरुआ आदि अर्पित करें।
  • चौमुखी दीपक जलाएं, धूप-दीप करें और तिलक लगाएं।
  • शिव चालीसा और भैरव चालीसा पाठ करें। आरती उतारें।
  • बटुक भैरव पंजर कवच का पाठ करें।
  • भैरव मंत्रों का 108 बार जप करें।
  • कालभैरव की उपासना करें।
  • व्रत का पालन करें (निर्जला या फलाहारी)।
  • काले कुत्ते को मीठी रोटी या कच्चा दूध पिलाएं।
  • सरसों के तेल, उड़द, दीपक, काले तिल आदि से काल भैरव की पूजा करें।

कालाष्टमी व्रत कथा

पौराणिक कथाओं में कालाष्टमी की व्रत कथा सुनी जाती है। एक बार भगवान विष्णु और ब्रह्मा के बीच विवाद हो गया कि कौन श्रेष्ठ है। यह विवाद बहुत बड़ा हो गया और देवताओं को लगा कि प्रलय होने वाला है। सभी देवताओं ने भगवान शिव के पास चले गए और समाधान की खोज में निकल पड़े। इसी बीच, भगवान शिव ने एक सभा बुलाई, जिसमें सभी ज्ञानी, ऋषि-मुनि, सिद्ध संत और अन्य उपस्थित थे, और उन्होंने विष्णु और ब्रह्मा को भी आमंत्रित किया।

सभा में एक निर्णय लिया गया जिसे भगवान विष्णु ने स्वीकार कर लिया, परंतु ब्रह्मा संतुष्ट नहीं होते। उन्होंने महादेव का अपमान किया। इस पर भगवान शिव रौद्र रूप धारण कर लिया। शांतिप्रिय शिव यह अपमान सहन नहीं कर सके और ब्रह्मा के अपमान से उनके रौद्र रूप का दर्शन हुआ। उनका रौद्र रूप देखकर तीनों लोक भयभीत हो गए। भगवान शिव के इस रौद्र रूप से भगवान भैरव प्रकट हुए। वे श्वान पर सवार थे और उनके हाथ में दंड था। इसके कारण उन्हें ‘दंडाधिपति’ कहा गया। भैरव का रूप अत्यंत भयंकर था। उन्होंने ब्रह्मा देव के पांचवें सिर को काट दिया, जिससे ब्रह्मा देव को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसके बाद, ब्रह्मा और विष्णु के बीच विवाद समाप्त हुआ और उन्होंने ज्ञान को प्राप्त किया, जिससे उनका अभिमान और अहंकार नष्ट हो गया।

कालाष्टमी व्रत मंत्र

शिवपुराण में कालभैरव की पूजा के दौरान इन मंत्रों का जप करना फलदायी माना जाता है।

अतिक्रूर महाकाय कल्पान्त दहनोपम्,

भैरव नमस्तुभ्यं अनुज्ञा दातुमर्हसि!!

अन्य मंत्र:

ओम भयहरणं च भैरव:।

ओम कालभैरवाय नम:।

ओम भ्रं कालभैरवाय फट्।

ओम ह्रीं बं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरूकुरू बटुकाय ह्रीं।

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