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कृच्छ्र चतुर्थी व्रत की सम्पूर्ण कथा

Krichchha Chaturthi Vrat Katha Hindi

Shri GaneshVrat Katha (व्रत कथा संग्रह)हिन्दी
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कृच्छ्र चतुर्थी व्रत, जिसे संकष्टी चतुर्थी या माघी चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है, हिन्दू धर्म में भगवान गणेश को समर्पित एक महत्वपूर्ण व्रत है। यह व्रत माघ (जनवरी-फरवरी) महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है। इस व्रत को करने से व्यक्ति के जीवन के संकट (कष्ट) दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। ‘कृच्छ्र’ का अर्थ होता है ‘कठिन’ या ‘कष्टदायक’, और इस व्रत को कठोरता से पालन करने के कारण ही इसे यह नाम मिला है।

|| कृच्छ्र चतुर्थी व्रत कथा (Krichchha Chaturthi Vrat Katha PDF) ||

कृच्छ्र चतुर्थी व्रत की कथा भगवान शिव और पार्वती से जुड़ी हुई है, जो इस व्रत के महत्व को बताती है। प्राचीन काल में त्रिपुरासुर नाम का एक अत्यंत बलशाली राक्षस था। वह अपनी क्रूरता और तपस्या के बल से प्राप्त वरदानों के कारण तीनों लोकों में आतंक मचा रहा था। देवता, मनुष्य और ऋषि-मुनि सभी उसके अत्याचारों से त्रस्त थे।

सभी देवता मिलकर भगवान ब्रह्मा और विष्णु के पास गए, लेकिन वे भी त्रिपुरासुर का वध करने में असमर्थ थे। अंततः, सभी ने मिलकर भगवान शिव से प्रार्थना की, क्योंकि केवल वही उस राक्षस को समाप्त करने की शक्ति रखते थे। देवताओं की प्रार्थना सुनकर, भगवान शिव त्रिपुरासुर का वध करने के लिए तैयार हो गए। उन्होंने एक विशाल और भव्य रथ का निर्माण करवाया, जिसमें सभी देवता विभिन्न अंगों के रूप में विराजमान थे।

युद्ध का आरंभ हुआ, लेकिन शिवजी ने युद्ध पर जाने से पहले प्रथम पूज्य भगवान गणेश का विधिवत पूजन नहीं किया। जब शिवजी ने त्रिपुरासुर पर अपने शक्तिशाली बाण का संधान किया, तो अचानक उनके रथ का पहिया टूट गया, धनुष की प्रत्यंचा ढीली पड़ गई, और उन्हें कई प्रकार के विघ्नों का सामना करना पड़ा।

शिवजी अत्यंत आश्चर्यचकित और चिंतित हो गए कि आखिर उनके जैसे देवों के देव को ऐसे साधारण विघ्न क्यों आ रहे हैं। जब शिवजी बहुत दुखी और निराश हो गए, तब देवर्षि नारद जी उनके पास प्रकट हुए। नारद जी ने शिवजी से कहा:

“हे महादेव! आपने युद्ध पर जाने से पूर्व विघ्नहर्ता भगवान गणेश का पूजन नहीं किया। किसी भी शुभ कार्य को आरम्भ करने से पहले उनकी पूजा करना अनिवार्य है, अन्यथा कार्य में बाधाएँ आती हैं। इसीलिए आपको यह कष्ट उठाना पड़ रहा है।”

नारद जी की बात सुनकर भगवान शिव को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने नारद जी से पूछा कि उन्हें यह भूल सुधारने और विजय प्राप्त करने के लिए क्या करना चाहिए। नारद जी ने उन्हें माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को कठोर कृच्छ्र चतुर्थी व्रत करने और भगवान गणेश का विधिवत पूजन करने की सलाह दी।

शिवजी ने नारद जी के बताए अनुसार माघ चतुर्थी के दिन कठोर तपस्या और व्रत का पालन किया। उन्होंने गणेश जी का ध्यान किया, उन्हें दूर्वा, मोदक और अन्य प्रिय वस्तुएं अर्पित कीं और उनका विधिवत पूजन किया। भगवान गणेश, शिवजी की सच्ची भक्ति और व्रत के कठोर नियम पालन से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने शिवजी को आशीर्वाद दिया और उनसे कहा कि अब उनके मार्ग में कोई विघ्न नहीं आएगा।

गणेश जी की कृपा से शिवजी ने पुनः युद्ध का आरम्भ किया। इस बार उनके रथ में कोई बाधा नहीं आई और उन्होंने अपने एक ही बाण से त्रिपुरासुर का वध कर दिया, जिससे तीनों लोकों को उसके आतंक से मुक्ति मिली। चूँकि भगवान शिव ने स्वयं अपने जीवन के सबसे बड़े कष्ट (युद्ध में विघ्न) को दूर करने के लिए माघ मास की चतुर्थी तिथि को यह व्रत किया था, इसलिए इस तिथि को कृच्छ्र चतुर्थी (कष्टों को दूर करने वाली चतुर्थी) कहा जाने लगा।

मान्यता: जो भक्त इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत करके भगवान गणेश और चन्द्रमा का पूजन करते हैं, उनके जीवन के सभी विघ्न, संकट और कष्ट दूर होते हैं और उन्हें शिवजी के समान ही विजय और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

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