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नृसिंह द्वादशी विशेष – क्यों हिरण्यकश्यप को मारने के लिए भगवान को लेना पड़ा इतना भयानक रूप?

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हिंदू धर्मग्रंथों में भगवान विष्णु के दशावतारों की कथाएं केवल पौराणिक कहानियां नहीं हैं, बल्कि वे अधर्म पर धर्म की विजय और ब्रह्मांडीय संतुलन के गहरे दर्शन को समेटे हुए हैं। इन्हीं में से एक सबसे शक्तिशाली और रोंगटे खड़े कर देने वाला अवतार है – भगवान नृसिंह।

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को नृसिंह द्वादशी के रूप में मनाया जाता है। लेकिन मन में सवाल उठता है कि सौम्य और शांत रहने वाले विष्णु को आखिर इतना उग्र और आधा मनुष्य, आधा सिंह (नर-सिंह) का रूप क्यों धारण करना पड़ा? चलिए, इस रहस्य की गहराई में उतरते हैं।

हिरण्यकश्यप को प्राप्त ब्रह्मा जी का – ‘अजेय’ वरदान

हिरण्यकश्यप कोई साधारण असुर नहीं था। उसने ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर एक ऐसा ‘अजेय’ वरदान प्राप्त कर लिया था, जिसने उसे लगभग अमर बना दिया था। वरदान की शर्तें कुछ ऐसी थीं:

  • वह न किसी मनुष्य द्वारा मारा जाए, न किसी पशु द्वारा।
  • वह न घर के भीतर मरे, न बाहर।
  • उसकी मृत्यु न दिन में हो, न रात में।
  • वह न भूमि पर मरे, न आकाश में।
  • उसे न किसी अस्त्र (फेंक कर चलाने वाले) से मारा जा सके, न किसी शस्त्र (हाथ में पकड़े जाने वाले) से।

हिरण्यकश्यप को लगा कि उसने मृत्यु के हर रास्ते को बंद कर दिया है। लेकिन अहंकार में वह भूल गया कि ईश्वर की बुद्धि और सृष्टि की रचना असीमित है।

नृसिंह रूप ही क्यों? एक दिव्य ‘चेकमेट’

भगवान विष्णु ने हिरण्यकश्यप के वरदान का सम्मान करते हुए भी उसे समाप्त करने के लिए एक ऐसा रूप चुना जो ‘लॉजिक’ और ‘मिरेकल’ का अद्भुत संगम था।

  • न मनुष्य, न पशु – भगवान ने ‘नृसिंह’ रूप लिया। सिर सिंह का (पशु) और धड़ मनुष्य का। इस तरह वह न पूरी तरह इंसान थे और न ही जानवर।
  • न अस्त्र, न शस्त्र – भगवान ने तलवार या चक्र का उपयोग नहीं किया, बल्कि अपने तीखे नाखूनों का इस्तेमाल किया। नाखून न अस्त्र की श्रेणी में आते हैं, न शस्त्र की।
  • न घर के अंदर, न बाहर – वध के लिए भगवान ने उसे चौखट (दहलीज) पर ले लिया। चौखट न घर का अंदरूनी हिस्सा होती है और न ही बाहरी मैदान।
  • न भूमि पर, न आकाश में – भगवान ने असुर को अपनी गोद (जांघों) पर लिटाया। इस तरह वह न जमीन पर था और न हवा में।
  • न दिन, न रात – वध का समय चुना गया ‘गोधूलि बेला’ (संध्याकाल), जब सूर्य डूब रहा होता है यह समय न दिन कहलाता है और न रात।

इस ‘भयानक’ रूप का आध्यात्मिक अर्थ

नृसिंह अवतार का स्वरूप भले ही डरावना लगे, लेकिन भक्तों के लिए यह परम सुरक्षा का प्रतीक है।

  • भक्त के लिए कोमलता, दुष्ट के लिए उग्रता – भगवान नृसिंह का रूप यह संदेश देता है कि ईश्वर अपने भक्त (प्रह्लाद) के लिए जितना कोमल है, धर्म की रक्षा के लिए उतना ही कठोर और विनाशकारी भी हो सकता है।
  • हर कण में ईश्वर – जब हिरण्यकश्यप ने पूछा कि “क्या तुम्हारा भगवान इस खंभे में है?” और खंभा चीरकर नृसिंह प्रकट हुए, तो उन्होंने सिद्ध कर दिया कि परमात्मा सर्वव्यापी है।
  • अहंकार का अंत – यह अवतार सिखाता है कि आप चाहे जितने भी बुद्धिमान या शक्तिशाली क्यों न हो जाएं, आप प्रकृति और ईश्वर के विधान से ऊपर नहीं निकल सकते।

नृसिंह द्वादशी पर क्या करें?

इस विशेष दिन पर भगवान नृसिंह की पूजा करने से शत्रुओं पर विजय मिलती है और जीवन के बड़े से बड़े संकट टल जाते हैं।

  • मंत्र जाप – “ॐ नृं नृसिंहाय नमः” का जाप करने से मानसिक शक्ति और साहस प्राप्त होता है।
  • दान-पुण्य – गर्मी का समय होने के कारण ठंडे जल, शरबत या मौसमी फलों का दान अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • संकल्प – आज के दिन अपने भीतर के ‘क्रोध’ और ‘अहंकार’ रूपी हिरण्यकश्यप को समाप्त करने का संकल्प लें।

भगवान नृसिंह का यह अवतार हमें विश्वास दिलाता है कि जब अधर्म की सीमाएं पार हो जाती हैं, तब सत्य की रक्षा के लिए ईश्वर असंभव को भी संभव कर देता है।

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