|| माँ भैरवी की कथा ||
यह कथा भगवान शिव और उनकी पहली पत्नी माता सती से जुड़ी है। माता सती को ही उनकी दूसरी पत्नी माता पार्वती के रूप में पुनर्जन्म माना जाता है। भैरवी महाविद्या की कहानी के अनुसार, एक बार माता सती के पिता राजा दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था।
राजा दक्ष भगवान शिव से द्वेष रखते थे और अपनी पुत्री सती के द्वारा उनसे विवाह किए जाने के कारण नाराज थे। इसलिए उन्होंने उन दोनों को इस यज्ञ में नहीं बुलाया। भगवान शिव इस बारे में जानते थे, लेकिन माता सती इस बात से अनजान थीं।
यज्ञ से पहले जब माता सती ने आकाश मार्ग से सभी देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों को उस ओर जाते देखा, तो उन्होंने अपने पति से इसका कारण पूछा। भगवान शिव ने माता सती को सब सच बता दिया और निमंत्रण न होने की बात कही। तब माता सती ने भगवान शिव से कहा कि एक पुत्री को अपने पिता के यज्ञ में जाने के लिए निमंत्रण की आवश्यकता नहीं होती है।
माता सती अकेले ही यज्ञ में जाना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने अपने पति शिव से अनुमति मांगी, किंतु उन्होंने मना कर दिया। माता सती के बार-बार आग्रह करने पर भी शिव नहीं माने, तो माता सती को क्रोध आ गया और उन्होंने शिव को अपनी महत्ता दिखाने का निर्णय लिया।
तब माता सती ने भगवान शिव को अपने 10 रूपों के दर्शन दिए, जिनमें से पांचवीं माँ भैरवी देवी थीं। मातारानी के यही 10 रूप दस महाविद्या कहलाए। अन्य नौ रूपों में क्रमशः काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला आती हैं।
माँ भैरवी की पूजा करने से हमें उनके रूप के अनुसार दो तरह के लाभ मिलते हैं। पहले रूप के अनुसार हमें बुरी आदतों, शक्तियों और आत्माओं के प्रभाव से मुक्ति मिलती है। इसके अलावा, यदि व्यक्ति को किसी तरह की शारीरिक कमजोरी है, तो भी उसे माँ भैरवी के इस रूप की पूजा करनी चाहिए। माँ का यह रूप अपने भक्तों को सभी प्रकार के भय से मुक्ति प्रदान करता है और अभय प्रदान करता है।
माँ के दूसरे रूप से हमारे वैवाहिक जीवन या प्रेम जीवन में सुधार देखने को मिलता है। यदि आप एक अच्छे जीवनसाथी को खोज रहे हैं, तो आपको माँ भैरवी के सुंदर रूप की पूजा करनी चाहिए। साथ ही, यदि आपका विवाह हो चुका है, तो उसके सुखमय रहने की भी प्रबल संभावना है।
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