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देवताओं का दिन ‘उत्तरायण’ – क्यों इस दिन दान और स्नान का होता है विशेष फल?

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क्या आपने कभी सोचा है कि कड़कड़ाती ठंड के बीच जब 14 या 15 जनवरी के आसपास सूर्य देवता अपनी चाल बदलते हैं, तो भारतीय जनमानस में एक नई ऊर्जा क्यों दौड़ जाती है? यह केवल मौसम बदलने का संकेत नहीं है, बल्कि यह वह समय है जब ‘देवता अपनी नींद से जागते हैं’।

जी हाँ, शास्त्रों में उत्तरायण को देवताओं का दिन कहा गया है। लेकिन आखिर क्यों सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करते ही गंगा तटों पर जनसैलाब उमड़ पड़ता है? क्यों तिल और गुड़ का दान इतना महत्वपूर्ण हो जाता है? आइए, इस महापर्व के पीछे छिपे पौराणिक रहस्यों और वैज्ञानिक तथ्यों की परतों को खोलते हैं।

उत्तरायण – देवताओं का सूर्योदय (The Day of Gods)

आम तौर पर हम 24 घंटे का एक दिन मानते हैं, लेकिन ब्रह्मांडीय गणना (Cosmic Calculation) इससे काफी अलग है। हिंदू शास्त्रों और ‘सूर्य सिद्धांत’ के अनुसार, मनुष्यों का एक साल देवताओं के एक दिन-रात के बराबर होता है।

  • दक्षिणायन (देवताओं की रात्रि) – जब सूर्य दक्षिण की ओर झुकता है (जुलाई से जनवरी), तो यह देवताओं की रात मानी जाती है। यह विश्राम और सुप्तावस्था का समय होता है।
  • उत्तरायण (देवताओं का दिन) – मकर संक्रांति के दिन से सूर्य उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) की ओर बढ़ना शुरू करता है। यह देवताओं का ‘ब्रह्म मुहूर्त’ या सूर्योदय है।

यही कारण है कि भीष्म पितामह ने महाभारत युद्ध में बाणों की शैया पर लेटे रहने के बावजूद अपने प्राण नहीं त्यागे थे। उन्होंने 58 दिनों तक असहनीय पीड़ा सही, सिर्फ इसलिए ताकि वे ‘उत्तरायण’ के पवित्र काल में शरीर त्याग सकें और मोक्ष (जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति) प्राप्त कर सकें।

पिता-पुत्र के मिलन की अनसुनी कहानी (Mythology of Surya & Shani)

मकर संक्रांति पर दान का महत्व समझने के लिए हमें एक रोचक पौराणिक कथा जाननी होगी जो बहुत कम लोग जानते हैं। यह कहानी सूर्य देव और उनके पुत्र शनि देव के खट्टे-मीठे रिश्तों की है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, सूर्य देव अपने पुत्र शनि से रुष्ट थे और उन्होंने शनि के घर (कुंभ राशि) को जला दिया था। लेकिन जब सूर्य देव का क्रोध शांत हुआ, तो वे मकर संक्रांति के दिन अपने पुत्र शनि के दूसरे घर (मकर राशि) उनसे मिलने पहुंचे।

शनि देव के पास अपने पिता के स्वागत के लिए कुछ नहीं था, सिवाय काले तिल के। उन्होंने उसी से अपने पिता का पूजन किया। सूर्य देव ने प्रसन्न होकर वरदान दिया कि “जो भी व्यक्ति मकर संक्रांति के दिन मुझे काले तिल और गुड़ अर्पित करेगा या दान करेगा, उसके जीवन से शनि दोष और सभी कष्ट दूर हो जाएंगे।”

यही वजह है कि इस दिन तिल-गुड़ के दान और सेवन का इतना विशेष महत्व है। यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि रिश्तों में मिठास घोलने का प्रतीक है।

स्नान का महत्व – जल नहीं, ऊर्जा का स्रोत

मकर संक्रांति पर गंगा, यमुना या किसी भी पवित्र नदी में स्नान करना केवल शरीर की सफाई नहीं है।

  • वैज्ञानिक पहलू – उत्तरायण के समय सूर्य की किरणें सीधे पृथ्वी पर पड़ती हैं, जिससे जल में एक विशेष प्रकार की जैव-विद्युत (Bio-electricity) उत्पन्न होती है। भोर में नदी स्नान करने से हमारा शरीर उस कॉस्मिक ऊर्जा को ग्रहण करता है, जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
  • आध्यात्मिक पहलू – माना जाता है कि देवताओं के दिन की शुरुआत में किया गया स्नान आत्मा के पापों को धो देता है और चेतना को जागृत करता है।

दान क्यों? और खिचड़ी ही क्यों?

इस दिन को कई जगहों पर ‘खिचड़ी पर्व’ भी कहा जाता है। लेकिन दान में खिचड़ी ही क्यों?

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार

  • चावल चंद्रमा का प्रतीक है (मन की शांति)।
  • उड़द की दाल शनि का प्रतीक है (कष्टों का निवारण)।
  • हल्दी गुरु का प्रतीक है (सौभाग्य)।
  • हरी सब्जियां बुध का प्रतीक हैं (बुद्धि)।

जब आप खिचड़ी का दान करते हैं या खाते हैं, तो आप एक साथ सभी नवग्रहों को शांत कर रहे होते हैं। साथ ही, सर्दी के मौसम में शरीर को अंदर से गर्म रखने के लिए तिल और गुड़ का सेवन ‘साइंटिफिक सुपरफूड’ (Scientific Superfood) की तरह काम करता है।

एक देश, अनेक नाम (Cultural Unity)

यह पर्व भारत की विविधता में एकता का सबसे बड़ा उदाहरण है। उद्देश्य एक ही है – सूर्य का स्वागत – लेकिन तरीके अलग:

  • पंजाब में इसे ‘माघी’ और ‘लोहड़ी’ के रूप में मनाते हैं।
  • असम में ‘माघ बिहू’ के नाम से।
  • तमिलनाडु में इसे ‘पोंगल’ कहा जाता है, जहाँ नई फसल का चावल पकाया जाता है।
  • गुजरात में यह ‘उत्तरायण’ है, जहाँ पतंगें उड़ाकर आकाश को रंगीन कर दिया जाता है।

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