विघ्नेश्वर चतुर्थी, जिसे हम संकष्टी चतुर्थी के रूप में भी जानते हैं, भगवान गणेश को प्रसन्न करने और जीवन के संकटों को दूर करने का महापर्व है। यदि आप भी अपने घर में सुख-शांति और समृद्धि के लिए इस व्रत को करने का संकल्प ले रहे हैं, तो यह लेख आपके लिए एक संपूर्ण मार्गदर्शिका साबित होगा।
यहाँ हम जानेंगे कि कैसे आप घर पर ही पूरी शास्त्रीय विधि से पूजा कर सकते हैं, व्रत की प्राचीन कथा क्या है और आरती के समय किन विशेष नियमों का पालन करना अनिवार्य है।
विघ्नेश्वर चतुर्थी पूजा की पूर्व तैयारी
पूजा शुरू करने से पहले मन की शुद्धि और घर की स्वच्छता अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि से निवृत्त हों और लाल या पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में एक चौकी रखें। उस पर लाल कपड़ा बिछाएं और गंगाजल छिड़ककर स्थान को पवित्र करें।
- पूजा के लिए दूर्वा (घास), मोदक, पीले फूल, सिंदूर, अक्षत, सुपारी, जनेऊ, धूप और घी का दीपक तैयार रखें।
घर पर पूजा की संपूर्ण विधि
शास्त्रों के अनुसार गणेश जी की पूजा ‘षोडशोपचार’ विधि से करना श्रेष्ठ माना गया है, लेकिन सरल भाव से आप निम्न चरणों का पालन कर सकते हैं:
- चौकी पर गणेश जी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। साथ में एक जल से भरा कलश रखें।
- हाथ में जल और अक्षत लेकर संकल्प लें कि आप अपनी मनोकामना (या निष्काम भाव) के लिए यह व्रत कर रहे हैं।
- मूर्ति को जल और पंचामृत से स्नान कराएं। तत्पश्चात उन्हें सिंदूर का तिलक लगाएं और जनेऊ अर्पित करें।
- भगवान गणेश को 21 दूर्वा की गांठें “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र के साथ अर्पित करें। यह उन्हें अत्यंत प्रिय है।
- गणेश जी को कम से कम 5 या 21 मोदक या लड्डू का भोग लगाएं।
विघ्नेश्वर (संकष्टी) चतुर्थी व्रत कथा
प्राचीन कथा के अनुसार, एक बार सभी देवता भारी विपदा में फंस गए थे और वे मदद के लिए महादेव के पास पहुंचे। उस समय शिव जी के पास कार्तिकेय और गणेश दोनों विराजमान थे। महादेव ने परीक्षा लेने के लिए कहा कि जो पृथ्वी की परिक्रमा सबसे पहले करेगा, वही देवताओं के संकट दूर करने जाएगा।
कार्तिकेय अपने मयूर पर सवार होकर निकल गए, लेकिन गणेश जी ने अपनी बुद्धि का प्रयोग करते हुए अपने माता-पिता (शिव-पार्वती) की सात बार परिक्रमा की और हाथ जोड़कर खड़े हो गए। जब उनसे कारण पूछा गया, तो उन्होंने कहा – “माता-पिता के चरणों में ही समस्त लोक और ब्रह्मांड समाया है।”
शिव जी उनकी बुद्धिमानी से प्रसन्न हुए और उन्हें विघ्नहर्ता होने का वरदान दिया। तभी से किसी भी कार्य की निर्विघ्न समाप्ति के लिए विघ्नेश्वर चतुर्थी का व्रत और गणेश पूजन की परंपरा शुरू हुई।
आरती के नियम और चंद्र दर्शन का महत्व
पूजा का समापन आरती के बिना अधूरा माना जाता है, लेकिन इसके कुछ विशेष नियम हैं:
- गणेश जी की आरती करते समय दीपक को गोलाकार घुमाएं। आरती के समय मन में किसी के प्रति द्वेष न रखें।
- आरती के बाद भगवान पर पुष्प और अक्षत वर्षा करें।
- संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्रमा को अर्घ्य दिए बिना व्रत पूर्ण नहीं होता। रात में चांदी के पात्र या तांबे के लोटे से दूध और जल मिलाकर चंद्रमा को अर्घ्य दें।
- पूजा के अंत में अनजाने में हुई भूलचूक के लिए भगवान से क्षमा याचना अवश्य करें।
विशेष फल प्राप्ति के मंत्र
पूजा के दौरान इन मंत्रों का जाप करने से मानसिक शांति और कार्य सिद्धि होती है: “वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥”
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