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भगवान विष्णु को क्यों इतना प्रिय है आंवला? आमलकी एकादशी की यह कथा आपको चौंका देगी।

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हिंदू धर्म में प्रकृति और परमात्मा का अटूट संबंध रहा है। पीपल, तुलसी और बरगद की तरह ही आंवले के वृक्ष का विशेष महत्व है। विशेषकर ‘आमलकी एकादशी’ के दिन आंवले की पूजा का विधान है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि एक साधारण सा फल भगवान विष्णु को इतना प्रिय क्यों है कि उन्होंने इसे अपना निवास स्थान बना लिया? आज के इस लेख में हम उस प्राचीन और रहस्यमयी कथा का अन्वेषण करेंगे, जो न केवल आपको चकित कर देगी, बल्कि भक्ति के प्रति आपके दृष्टिकोण को भी बदल देगी।

आंवले की उत्पत्ति – सृष्टि के सृजन से जुड़ा रहस्य

पद्म पुराण और ब्रह्मांड पुराण के अनुसार, आंवले की उत्पत्ति किसी बीज से नहीं, बल्कि स्वयं भगवान विष्णु के आंसुओं से हुई है।

कथा कुछ इस प्रकार है, जब भगवान विष्णु ने सृष्टि की रचना का संकल्प लिया और ब्रह्मा जी को प्रकट किया, तब स्वयं के अस्तित्व और ब्रह्मांड की विशालता को देखकर श्री हरि भावविभोर हो गए। उनकी आंखों से प्रेम और आनंद के कुछ आंसू पृथ्वी पर गिरे।

मान्यता है कि इन्हीं पवित्र आंसुओं से ‘आमलकी’ यानी आंवले के वृक्ष की उत्पत्ति हुई। चूंकि यह वृक्ष भगवान के आनंद के आंसुओं से जन्मा है, इसलिए यह उन्हें प्राणों से भी प्रिय है। इसे ‘आदि वृक्ष’ भी कहा जाता है क्योंकि यह सृष्टि का पहला फलदार वृक्ष माना जाता है।

आमलकी एकादशी की वह कथा जो आपको चौंका देगी, फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली आमलकी एकादशी का महत्व एक विशेष पौराणिक घटना से जुड़ा है। प्राचीन काल में चित्रसेन नामक एक राजा थे, जो अत्यंत धार्मिक थे। एक बार शिकार के दौरान वे जंगल में रास्ता भटक गए और डाकुओं के एक समूह ने उन्हें घेर लिया।

जब डाकुओं ने राजा पर शस्त्रों से वार करना शुरू किया, तो राजा के शरीर से एक दिव्य ज्योति निकली और एक देवी प्रकट हुईं। उस देवी ने अकेले ही सभी डाकुओं का संहार कर दिया।

जब राजा की चेतना लौटी, तो उन्होंने पूछा कि मेरी रक्षा किसने की? तब आकाशवाणी हुई कि यह तुम्हारी आमलकी एकादशी के व्रत का प्रभाव है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, आंवले के पेड़ के हर हिस्से में देवताओं का वास होता है। इसकी जड़ में विष्णु, तने में शिव, शाखाओं में ऋषि-मुनि और फल में स्वयं मां लक्ष्मी का निवास माना जाता है।

भगवान विष्णु और आंवले के बीच का आध्यात्मिक संबंध

भगवान विष्णु को ‘सत्यनारायण’ कहा जाता है, और आंवला आयुर्वेद में ‘अमृत’ के समान है। इन दोनों के बीच के जुड़ाव के पीछे कई गहरे कारण हैं:

  • आरोग्य और सात्विकता – विष्णु पालनहार हैं। आंवला विटामिन-C का सबसे बड़ा स्रोत है और शरीर को लंबी आयु (अमरत्व के करीब) प्रदान करता है। जो आरोग्य देता है, वह विष्णु को प्रिय होना स्वाभाविक है।
  • लक्ष्मी का प्रिय वास – देवी लक्ष्मी को आंवले का फल अत्यंत प्रिय है। जहां लक्ष्मी होती हैं, वहां नारायण स्वतः ही विराजमान हो जाते हैं।
  • पाप विनाशिनी शक्ति – शास्त्रों में लिखा है कि आंवले के पेड़ के नीचे बैठकर भगवान का ध्यान करने या भोजन करने से व्यक्ति के जन्म-जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं।

आमलकी एकादशी पर क्या करें?

यदि आप इस दिन भगवान विष्णु की विशेष कृपा पाना चाहते हैं, तो इन चरणों का पालन करें:

  • आंवले के वृक्ष का पूजन – वृक्ष की जड़ में जल अर्पित करें और सात बार परिक्रमा करें।
  • दान का महत्व – इस दिन आंवले का फल दान करना स्वर्ण दान के समान फलदायी माना गया है।
  • सात्विक आहार – यदि संभव हो, तो इस दिन भोजन में आंवले का सेवन जरूर करें।

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