भारत की पवित्र भूमि पर ऐसे कई स्थान हैं, जहाँ साक्षात देवी-देवताओं का वास माना जाता है। इन्हीं में से एक है जम्मू-कश्मीर के कटरा में स्थित त्रिकूट पर्वत, जहाँ आदिशक्ति मां वैष्णो देवी एक गुफा में पिंडी रूप में विराजमान हैं। हर साल लाखों श्रद्धालु यहाँ आकर माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस पवित्र स्थान पर मां वैष्णो देवी की स्थापना कैसे हुई? और क्या सच में माता यहाँ आज भी प्रकट होती हैं? आइए, इन सभी सवालों के जवाब विस्तार से जानते हैं।
त्रिकूट पर्वत पर मां वैष्णो देवी की स्थापना का रहस्य
मां वैष्णो देवी की त्रिकूट पर्वत पर स्थापना से जुड़ी कई पौराणिक कथाएँ और जनश्रुतियाँ प्रचलित हैं। इनमें से सबसे प्रमुख और स्वीकार्य कथा श्रीधर पुजारी से संबंधित है।
कथा के अनुसार, आज से लगभग 700 साल पहले, कटरा के पास हँसली गाँव में श्रीधर नाम के एक ब्राह्मण रहते थे। वे अत्यंत गरीब थे, लेकिन माता वैष्णो देवी के परम भक्त थे। एक दिन माता ने एक कन्या के रूप में उन्हें दर्शन दिए और उनसे एक ‘भंडारा’ आयोजित करने को कहा। श्रीधर इस बात को लेकर चिंतित थे कि वे इतने बड़े भंडारे का प्रबंध कैसे करेंगे, लेकिन माता ने उन्हें आश्वासन दिया कि सब ठीक हो जाएगा।
माता के आशीर्वाद से श्रीधर ने भंडारे की तैयारी शुरू की। भंडारे में सभी गाँव वालों को आमंत्रित किया गया। यहाँ तक कि उस क्षेत्र के एक प्रभावशाली तांत्रिक, भैरों नाथ को भी निमंत्रण मिला। भंडारे के दौरान, माता ने श्रीधर को अपना असली रूप दिखाया और उन्हें अपनी दिव्य शक्तियों का अनुभव कराया।
भैरों नाथ, जो अपनी तांत्रिक शक्तियों पर घमंड करता था, माता की दिव्य शक्ति को देखकर आश्चर्यचकित रह गया। उसे लगा कि यह कोई सामान्य कन्या नहीं है। उसके मन में माता की परीक्षा लेने का विचार आया और उसने उनका पीछा करना शुरू कर दिया। माता, भैरों नाथ की बुरी मंशा को समझ गईं और उन्होंने उससे बचने के लिए त्रिकूट पर्वत की ओर प्रस्थान किया।
माता ने भैरों नाथ से बचने के लिए कई स्थानों पर पड़ाव डाले, जिनमें बाणगंगा, जहाँ उन्होंने अपने धनुष से गंगा की धारा प्रकट की; चरण पादुका, जहाँ उनके चरण चिन्ह आज भी मौजूद हैं; और अर्धकुंवारी, जहाँ उन्होंने नौ महीने तक तपस्या की, शामिल हैं।
अंततः, भैरों नाथ ने माता को त्रिकूट पर्वत पर एक गुफा में घेर लिया। माता ने उसे कई बार चेतावनी दी, लेकिन वह नहीं माना। तब माता ने क्रोधित होकर अपना रौद्र रूप धारण किया और भैरों नाथ का सिर धड़ से अलग कर दिया। भैरों नाथ का कटा हुआ सिर भैरों घाटी में जाकर गिरा, जहाँ आज उनका मंदिर स्थित है।
मरने से पहले, भैरों नाथ को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने माता से क्षमा याचना की। माता, जो भक्तों पर सदैव कृपा करती हैं, ने भैरों नाथ को क्षमा कर दिया और उसे आशीर्वाद दिया कि जो भी भक्त उनके दर्शन के बाद भैरों नाथ के दर्शन नहीं करेगा, उसकी यात्रा अधूरी मानी जाएगी।
इसके बाद, मां वैष्णो देवी त्रिकूट पर्वत की इसी गुफा में तीन दिव्य पिंडी के रूप में स्थापित हो गईं:
- महाकाली (दाहिनी पिंडी): यह पिंडी शक्ति, संहार और ज्ञान की देवी महाकाली का प्रतिनिधित्व करती है।
- महालक्ष्मी (मध्य पिंडी): यह पिंडी धन, समृद्धि और ऐश्वर्य की देवी महालक्ष्मी का प्रतीक है।
- महासरस्वती (बाईं पिंडी): यह पिंडी ज्ञान, विद्या और कला की देवी महासरस्वती को समर्पित है।
माना जाता है कि ये तीनों पिंडियां माता वैष्णो देवी के विभिन्न स्वरूपों को दर्शाती हैं, जो एक ही आदिशक्ति के अंश हैं।
क्या सच में यहाँ प्रकट होती हैं माता?
यह सवाल लाखों श्रद्धालुओं के मन में उठता है। “माता का प्रकट होना” एक आध्यात्मिक और अनुभवजन्य बात है। शारीरिक रूप से माता का प्रकट होना भले ही संभव न हो, लेकिन भक्तों का दृढ़ विश्वास है कि माता यहाँ आज भी साक्षात विराजमान हैं और अपने भक्तों की प्रार्थनाएं सुनती हैं।
- लाखों श्रद्धालु माता के दरबार से खाली हाथ नहीं लौटते। उन्हें यहाँ आकर मानसिक शांति, कष्टों से मुक्ति, मनोकामनाओं की पूर्ति और आत्मिक बल का अनुभव होता है। अनगिनत भक्त अपनी यात्रा के दौरान या उसके बाद माता के चमत्कारों और आशीर्वाद के किस्से सुनाते हैं। यह अनुभव ही भक्तों के लिए माता का “प्रकट होना” है।
- त्रिकूट पर्वत और गुफा के अंदर एक दिव्य ऊर्जा का अनुभव होता है, जो मन को शांत और आत्मा को शुद्ध करती है। यह ऊर्जा ही भक्तों को माता के साक्षात होने का आभास कराती है।
- वैष्णो देवी यात्रा केवल एक शारीरिक यात्रा नहीं है, बल्कि यह आस्था और विश्वास का प्रतीक है। भक्तों का अटूट विश्वास ही उन्हें इस कठिन यात्रा को पूरा करने और माता के आशीर्वाद को महसूस करने की शक्ति देता है।
इसलिए, हम कह सकते हैं कि मां वैष्णो देवी त्रिकूट पर्वत पर अपनी दिव्य ऊर्जा, आशीर्वाद और चमत्कारों के माध्यम से आज भी प्रकट होती हैं। यह भक्तों के लिए एक अनुभव है, जो शब्दों में बयान करना मुश्किल है।
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