सनातन धर्म में अनेक पर्व और उत्सव मनाए जाते हैं, जो जीवन के विभिन्न पहलुओं से जुड़े होते हैं। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण उत्सव है शाकम्भरी उत्सवारम्भ (Shakambhari Utsavarambh), जिसे शाकम्भरी नवरात्रि (Shakambhari Navratri) के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व माँ दुर्गा के करुणामय स्वरूप देवी शाकम्भरी को समर्पित है, जिन्हें वनस्पतियों, फलों और सब्जियों की देवी माना जाता है। यह उत्सव प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने और अन्नदाता देवी के आशीर्वाद से जीवन में समृद्धि (prosperity) और पोषण (nourishment) बनाए रखने का प्रतीक है। वर्ष 2025 में, शाकम्भरी उत्सवारम्भ कब शुरू हो रहा है, इसका क्या महत्व है और इस दौरान व्रत के नियम क्या हैं, आइए जानते हैं विस्तार से।
शाकम्भरी उत्सवारम्भ 2025 – शुभ तिथि और समय (Auspicious Date and Time)
पौष मास (Paush Month) की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से यह उत्सव आरंभ होता है और पौष पूर्णिमा (Paush Purnima) के दिन इसका समापन होता है। पूर्णिमा के दिन ही शाकम्भरी जयंती मनाई जाती है, जो इस उत्सव का मुख्य पर्व है।
- शाकम्भरी नवरात्रि रविवार, दिसम्बर 28, 2025 को
- शाकम्भरी जयन्ती शनिवार, जनवरी 3, 2026 को
- शाकम्भरी नवरात्रि रविवार, दिसम्बर 28, 2025 से प्रारम्भ
- शाकम्भरी नवरात्रि शनिवार, जनवरी 3, 2026 को समाप्त
- अष्टमी तिथि प्रारम्भ – दिसम्बर 27, 2025 को 01:09 PM बजे
- अष्टमी तिथि समाप्त – दिसम्बर 28, 2025 को 11:59 AM बजे
शाकम्भरी देवी कौन हैं? (Who is Goddess Shakambhari?)
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय जब पृथ्वी पर लगातार सौ वर्षों तक वर्षा नहीं हुई, तब भयंकर अकाल (famine) पड़ गया। चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। जीवन बचाने के लिए मनुष्य और जीव-जंतु (creatures) अन्न-जल के अभाव में मरने लगे।
भक्तों की प्रार्थना सुनकर, माँ दुर्गा ने करुणा से द्रवित होकर शाकम्भरी के रूप में अवतार लिया। माँ के सौ नेत्र थे, इसलिए उन्हें शताक्षी भी कहा गया। उनके शरीर से तुरंत हरी-भरी शाक-सब्जियाँ, फल और वनस्पतियाँ प्रकट हुईं, जिससे पृथ्वी का भरण-पोषण (sustenance) हुआ। माँ ने अपनी दया और शक्ति से धरती पर जीवन को फिर से स्थापित किया।
शाकम्भरी शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है:
- शाक (Shaak) – इसका अर्थ है शाक-सब्जी, फल और वनस्पति।
- भरी (Bhari) – इसका अर्थ है धारण करने वाली या पोषण करने वाली।
अतः, माँ शाकम्भरी को प्रकृति, हरियाली और पोषण की देवी (Goddess of nature and nutrition) के रूप में पूजा जाता है।
शाकम्भरी उत्सवारम्भ का महत्व (Significance of Shakambhari Utsavarambh)
यह उत्सव कई मायनों में अत्यधिक महत्वपूर्ण है:
- अन्न की कमी दूर करना (Removing Scarcity of Food) – मान्यता है कि इस दौरान माँ शाकम्भरी की पूजा करने से घर में कभी अन्न, फल और सब्जियों की कमी नहीं होती। देवी अपने भक्तों के भंडारे हमेशा भरे रखती हैं।
- प्रकृति के प्रति आभार (Gratitude Towards Nature) – यह पर्व हमें प्रकृति, जल और वनस्पतियों के प्रति अपना आभार व्यक्त करने का अवसर देता है, जो जीवन के आधार हैं।
- शारीरिक और मानसिक शुद्धता (Physical and Mental Purity) – गुप्त नवरात्रि की तरह इस उत्सव को भी तंत्र-मंत्र की साधना के लिए अति उत्तम माना जाता है। व्रत-उपवास से शारीरिक और मानसिक शुद्धता प्राप्त होती है।
- समृद्धि और आरोग्य (Prosperity and Health) – देवी की उपासना से भक्तों को उत्तम स्वास्थ्य (good health), धन-धान्य और समस्त प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है।
शाकम्भरी उत्सवारम्भ के व्रत-उपवास के नियम (Fasting Rules)
शाकम्भरी नवरात्रि के दौरान भक्तजन 7 दिनों तक उपवास रखते हैं और देवी की विशेष पूजा करते हैं।
- इन 7 दिनों में शुद्ध शाकाहारी भोजन ही ग्रहण करें। प्याज, लहसुन और तामसिक भोजन से पूर्ण रूप से बचें।
- व्रत के दौरान शारीरिक और मानसिक शुद्धता बनाए रखने के लिए ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य है।
- शाकम्भरी देवी को हरी सब्जियों और फलों का दान करने का विशेष महत्व है। व्रत के अंतिम दिन या रोजाना जरूरतमंदों को फल, सब्जियां और अन्न दान करें।
- किसी की निंदा या आलोचना करने और झूठ बोलने से बचें। मन में केवल माँ का ध्यान केंद्रित (concentrate) रखें।
- इन दिनों सात्विक जीवन व्यतीत करें और अनावश्यक भोग-विलास से दूर रहें।
शाकम्भरी उत्सवारम्भ पूजा विधि (Puja Rituals)
- पौष शुक्ल अष्टमी के दिन प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत्त होकर, साफ वस्त्र पहनें। पूजा स्थल पर एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर माँ शाकम्भरी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
- माँ के चारों ओर ताज़े फल, हरी सब्ज़ियाँ और फूल (fresh vegetables and flowers) अर्पित करें। देवी को विशेष रूप से हरी चुनरी और श्रृंगार सामग्री चढ़ाएं।
- हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प (vow) लें और पूरे विधि-विधान से पूजा करने का वचन लें।
- सर्वप्रथम श्री गणेश का पूजन करें, फिर माता शाकम्भरी का ध्यान करें।
- इस दौरान माँ शाकम्भरी के मंत्रों का जाप करें। एक सरल और प्रभावशाली मंत्र है: {ॐ ऐं ह्रीं क्लीं शाकम्भर्ये नमः}, या देवी भागवत पुराण में वर्णित मंत्र: {ॐ शाकम्भरी देव्यै नमः}।
- शाकम्भरी माता की कथा (Katha) का पाठ करें और अंत में घी का दीपक जलाकर आरती करें।
- मिश्री, मेवा, हलवा, पूरी और विशेष रूप से फल-सब्जियों का प्रसाद माँ को अर्पित करें और सभी सदस्यों में वितरित करें।
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