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मेरु त्रयोदशी क्यों मनाई जाती है? जानिए इसका धार्मिक इतिहास और पूजन की संपूर्ण विधि

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मेरु त्रयोदशी (Meru Trayodashi) जैन धर्म के सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र त्योहारों में से एक है। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि त्याग, तपस्या और मोक्ष की साधना का प्रतीक है। हर साल पौष माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी (तेरस) को मनाया जाने वाला यह पर्व प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) जी के निर्वाण कल्याणक के रूप में पूजा जाता है। यदि आप जानना चाहते हैं कि मेरु त्रयोदशी क्यों मनाई जाती है, इसका धार्मिक इतिहास क्या है और इस दिन पूजा कैसे करनी चाहिए, तो यह लेख आपके लिए ही है।

मेरु त्रयोदशी क्यों मनाई जाती है?

मेरु त्रयोदशी का सीधा संबंध जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) से है। जैन शास्त्रों के अनुसार, भगवान ऋषभदेव ने ही इस युग में मानवता को कृषि, मसि (लेखन), और असि (रक्षा) का ज्ञान दिया था।

निर्वाण का क्षण

हजारों वर्षों तक धर्म का प्रचार-प्रसार करने और संसार को सभ्यता का पाठ पढ़ाने के बाद, भगवान ऋषभदेव ‘अष्टापद’ पर्वत (कैलाश पर्वत) पर गए। वहां उन्होंने कठोर तपस्या की और पौष कृष्ण त्रयोदशी के दिन उन्हें निर्वाण (मोक्ष) की प्राप्ति हुई। उन्होंने जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पाकर सिद्ध गति प्राप्त की।

चूंकि यह घटना जैन धर्म के लिए एक युगांतकारी घटना थी, इसलिए इस दिन को ‘मेरु त्रयोदशी’ के रूप में मनाया जाता है। इसे ‘निर्वाण कल्याणक दिवस’ भी कहा जाता है।

‘मेरु’ शब्द का महत्व और प्रतीक

आप सोच रहे होंगे कि यदि यह निर्वाण दिवस है, तो इसका नाम ‘मेरु’ त्रयोदशी क्यों है?

जैन ब्रह्मांड विज्ञान (Cosmology) में मेरु पर्वत को ब्रह्मांड का केंद्र और सर्वोच्च शिखर माना जाता है। यह स्थिरता, अडिगता और सर्वोच्चता का प्रतीक है। भगवान ऋषभदेव का व्यक्तित्व और उनका त्याग मेरु पर्वत की तरह ही विशाल और अडिग था।

इस दिन भक्त संकल्प लेते हैं कि उनका धर्म और विश्वास भी मेरु पर्वत की तरह अडिग रहेगा। प्रतीकात्मक रूप से, 13 की संख्या (त्रयोदशी) और मेरु की संरचना का पूजन करके भक्त अपनी आत्मा को ऊंचाइयों पर ले जाने की कामना करते हैं।

मेरु त्रयोदशी पूजन की संपूर्ण विधि (Meru Trayodashi Puja Vidhi)

इस दिन की पूजा विधि विशेष होती है। भक्त भगवान आदिनाथ की आराधना करते हैं और विशेष रूप से 13 की संख्या का इस पूजा में बहुत महत्व होता है।

  • सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और शुद्ध वस्त्र धारण करें (श्वेत या पीले वस्त्र शुभ माने जाते हैं)। मन में अहिंसा और ब्रह्मचर्य का संकल्प लें।
  • जैन मंदिर (जिनालय) जाएं और भगवान आदिनाथ की प्रतिमा का प्रक्षाल (अभिषेक) करें। यदि घर पर व्यवस्था है, तो घर के चैत्यालय में भी यह विधि की जा सकती है। अभिषेक के समय ‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं श्री ऋषभदेव पारंगताय नमः’ मंत्र का जाप करें।
  • मंदिरों में धातु या चावल से बने ‘मेरु’ (एक शंक्वाकार संरचना जो पर्वत का प्रतीक है) की पूजा की जाती है। यदि मेरु उपलब्ध नहीं है, तो एक थाली में चावल से मेरु पर्वत की आकृति बनाएं और उस पर सुपाड़ी या बादाम रखकर उसे मेरु मानकर पूजें।
  • मेरु त्रयोदशी पर ’13’ अंक का विशेष महत्व है: भगवान के समक्ष घी के 13 दीपक जलाएं। 13 प्रकार के नैवेद्य (फल, मिठाई या सूखे मेवे) चढ़ाएं। अक्षत (चावल) से 13 स्वस्तिक (Gahuli) बनाएं और प्रत्येक पर खवासना (वंदन) करें।
  • इस दिन ‘निर्वाण कांड’ (Nirvan Kand) का पाठ अवश्य करना चाहिए, जिसमें सभी तीर्थंकरों के मोक्ष स्थलों का वर्णन है। ‘ॐ ह्रीं श्रीं आदिनाथाय नमः’ या ‘ॐ ह्रीं अर्हं श्री ऋषभदेव स्वामीने नमः’ की कम से कम 13 माला का जाप करें। पूजा के बाद भगवान ऋषभदेव के जीवन चरित्र और उनके वैराग्य की कथा सुननी चाहिए।
  • मेरु त्रयोदशी का व्रत आत्मा की शुद्धि के लिए किया जाता है। शक्ति अनुसार निर्जल उपवास करें या दिन में एक बार भोजन (एकाशना) करें।
  • यदि भोजन कर रहे हैं, तो सूर्यास्त से पहले (चौविहार) भोजन कर लें। भोजन सात्विक होना चाहिए, जिसमें कंदमूल (जमीन के नीचे उगने वाली सब्जियां) और हरी सब्जियों का त्याग होता है। इस दिन पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें। संभव हो तो रात्रि में भजन-कीर्तन या धर्म चर्चा करें।

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