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आमलकी एकादशी – असाध्य रोगों से मुक्ति और दीर्घायु जीवन का पौराणिक राज।

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सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है, लेकिन फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली आमलकी एकादशी का स्थान बेहद खास है। इसे ‘आमला एकादशी’ या ‘रंगभरी एकादशी’ के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह केवल एक व्रत नहीं, बल्कि आरोग्य प्राप्ति और आध्यात्मिक कायाकल्प का एक गुप्त मार्ग है। आइए गहराई से समझते हैं कि क्यों आमलकी एकादशी को असाध्य रोगों से मुक्ति और लंबी आयु का वरदान माना जाता है।

आमलकी एकादशी का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक आधार

हिंदू पुराणों के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा जी को उत्पन्न किया, उसी समय उन्होंने आंवले के वृक्ष को भी प्रकट किया। शास्त्रों में आंवले को ‘आदि वृक्ष’ कहा गया है।

  • देवताओं का वास – माना जाता है कि आंवले के वृक्ष के प्रत्येक अंग में ईश्वर का वास है। इसकी जड़ में विष्णु, तने में ब्रह्मा और शाखाओं में रुद्र का निवास होता है।
  • आयुर्वेद और सेहत – वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी आंवला ‘अमृतफल’ है। यह विटामिन-C का सबसे समृद्ध स्रोत है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को चरम पर ले जाता है। यही कारण है कि इस दिन आंवले के सेवन और पूजन को लंबी आयु से जोड़ा गया है।

असाध्य रोगों से मुक्ति का पौराणिक राज

पौराणिक कथाओं में एक राजा चित्रसेन का वर्णन आता है। अनजाने में किए गए इस व्रत के प्रभाव से राजा को उन शत्रुओं से मुक्ति मिली जो उनकी जान लेना चाहते थे। आध्यात्मिक रूप से, ‘शत्रु’ केवल बाहरी नहीं, बल्कि हमारे शरीर के रोग और विकार भी हैं।

आमलकी एकादशी व्रत से मिलने वाले लाभ

  • कायाकल्प – शास्त्रों के अनुसार, जो व्यक्ति इस दिन विधि-विधान से आंवले के वृक्ष की पूजा करता है, उसे समस्त पापों से मुक्ति मिलती है और शरीर की नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है।
  • मानसिक शांति – यह व्रत मन को स्थिर करता है, जिससे मानसिक तनाव और उससे होने वाली बीमारियों में कमी आती है।
  • दीर्घायु का वरदान – आंवले का पूजन और दान करने से जातक को आरोग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जो असमय मृत्यु के भय को दूर करता है।

व्रत और पूजन की सरल विधि

यदि आप भी स्वास्थ्य लाभ और पुण्य की प्राप्ति करना चाहते हैं, तो इस विधि का पालन करें:

  • सुबह जल्दी उठकर स्नान के जल में थोड़ा आंवले का रस मिलाकर स्नान करें।
  • भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।
  • किसी मंदिर या बगीचे में लगे आंवले के पेड़ की पूजा करें। पेड़ के चारों ओर सात बार सूती धागा लपेटें और घी का दीपक जलाएं।
  • इस दिन आंवले का फल भगवान को अर्पित करें और गरीबों में इसका दान करें।
  • यदि पूर्ण उपवास संभव न हो, तो केवल फलाहार करें और अन्न का त्याग करें।

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