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वासुदेव चतुर्थी व्रत कथा

Vasudev Chaturthi Vrat Katha Hindi

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हिंदू धर्म में वासुदेव चतुर्थी का विशेष महत्व है। यह व्रत भगवान श्री कृष्ण (वासुदेव) को समर्पित है और मुख्य रूप से भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। कई स्थानों पर इसे ‘बहुला चतुर्थी’ या ‘संकष्टी चतुर्थी’ के रूप में भी श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है।

|| वासुदेव चतुर्थी व्रत कथा ||

प्राचीन काल की कथा के अनुसार, एक समय भगवान श्री कृष्ण और युधिष्ठिर के बीच संवाद हो रहा था। धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान से पूछा – “हे जनार्दन! भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी का क्या महत्व है? इस दिन किस देवता की पूजा करनी चाहिए और इसका फल क्या है?”

भगवान श्री कृष्ण ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया – “हे कुंतीपुत्र! यह तिथि ‘वासुदेव चतुर्थी’ के नाम से विख्यात है। इस दिन मेरा (वासुदेव का) पूजन करने से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं और उसे अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसकी महिमा को समझने के लिए एक पौराणिक कथा प्रचलित है।”

कथा के अनुसार, सत्ययुग में एक प्रतापी राजा हुआ करते थे। उनके राज्य में प्रजा सुखी थी, परंतु स्वयं राजा संतानहीन होने के कारण अत्यंत दुखी रहते थे। उन्होंने अनेक यज्ञ और दान किए, किंतु मनोरथ सिद्ध नहीं हुआ। तब एक ऋषि ने उन्हें वासुदेव चतुर्थी का व्रत करने का सुझाव दिया।

ऋषि ने बताया – “हे राजन! आप भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को विधि-विधान से भगवान वासुदेव की स्वर्ण प्रतिमा बनवाकर पूजा करें। निराहार रहकर रात्रि जागरण करें और अगले दिन ब्राह्मणों को दान दें।”

राजा ने पूर्ण श्रद्धा के साथ यह व्रत किया। व्रत के प्रभाव से भगवान वासुदेव प्रसन्न हुए और उन्हें एक तेजस्वी पुत्र का वरदान दिया। कुछ समय पश्चात रानी ने एक अत्यंत सुंदर और धर्मात्मा पुत्र को जन्म दिया। राजा का राज्य धन-धान्य और सुख-शांति से भर गया।

|| वासुदेव चतुर्थी व्रत की पूजन विधि ||

इस व्रत को करने वाले साधक को निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए:

  • प्रातः काल स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान वासुदेव के सम्मुख हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।
  • एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान श्री कृष्ण या वासुदेव की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
  • भगवान को पंचामृत से स्नान कराएं। उसके बाद उन्हें पीले पुष्प, चंदन, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य (विशेषकर माखन-मिश्री) अर्पित करें।
  • पूजा के दौरान “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का निरंतर जप करें।
  • रात्रि में चंद्रमा उदय होने पर उन्हें जल, रोली और अक्षत से अर्घ्य दें।
  • अगले दिन सुबह ब्राह्मणों को भोजन कराकर या दान-दक्षिणा देकर स्वयं व्रत खोलें।

|| वासुदेव चतुर्थी व्रत का महत्व और फल ||

  • यह व्रत निसंतान दंपत्तियों के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।
  • अनजाने में किए गए पापों के प्रायश्चित के लिए यह उत्तम दिन है।
  • भगवान वासुदेव की कृपा से घर में कभी लक्ष्मी की कमी नहीं रहती।
  • जो व्यक्ति पूर्ण निष्ठा से इस दिन कथा श्रवण करता है, उसे मानसिक क्लेशों से मुक्ति मिलती है।
  • वासुदेव चतुर्थी का व्रत करने से साधक को वही पुण्य प्राप्त होता है जो अश्वमेध यज्ञ करने से मिलता है।

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