हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत आत्मिक शुद्धि और श्री हरि विष्णु की कृपा प्राप्त करने का सबसे बड़ा माध्यम माना जाता है। लेकिन साल भर की 24 एकादशियों में ‘आमलकी एकादशी’ अपना एक विशिष्ट और रहस्यमयी स्थान रखती है। होली से कुछ दिन पहले आने वाली यह एकादशी न केवल भक्ति, बल्कि प्रकृति और स्वास्थ्य के अद्भुत संगम का प्रतीक है। आइए जानते हैं इस दिन के पीछे का आध्यात्मिक रहस्य और आंवले के पेड़ की पूजा का वैज्ञानिक आधार।
आमलकी एकादशी का आध्यात्मिक महत्व
शास्त्रों के अनुसार, ‘आमलकी’ का अर्थ है आंवला। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा जी को उत्पन्न किया, उसी समय उन्होंने आंवले के वृक्ष को भी जन्म दिया। विष्णु पुराण में उल्लेख है कि आंवले का वृक्ष भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है और इसके हर हिस्से में देवताओं का वास होता है।
- जड़ में – भगवान विष्णु
- तने में – भगवान शिव
- ऊपरी भाग में – ब्रह्मा जी
- शाखाओं में – ऋषि-मुनि
- फूलों में – माता लक्ष्मी
यही कारण है कि इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा करना साक्षात श्री हरि की आराधना करने के समान माना जाता है।
आंवले के पेड़ की पूजा का रहस्य
इस दिन विशेष रूप से आंवले के पेड़ के नीचे बैठकर पूजन करने और वहीं भोजन करने की परंपरा है। इसके पीछे कई गहरे कारण छिपे हैं:
- अक्षय पुण्य की प्राप्ति – माना जाता है कि आमलकी एकादशी के दिन आंवले के पेड़ के नीचे पूजा करने से सौ गायों के दान के बराबर पुण्य मिलता है। यह व्रत मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
- आयुर्वेद और स्वास्थ्य का मेल – फाल्गुन मास में जब मौसम बदल रहा होता है, तब शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को बढ़ाने के लिए आंवला सर्वोत्तम औषधि है। इस दिन आंवले का सेवन और इसके स्पर्श को शास्त्र और विज्ञान दोनों ही स्वास्थ्यवर्धक मानते हैं।
- शुद्धिकरण का प्रतीक – जिस प्रकार आंवला शरीर के विषैले तत्वों (Toxins) को बाहर निकालता है, उसी प्रकार इस व्रत को रखने से मन और आत्मा के विकार दूर होते हैं।
पूजा की विधि और खास नियम
आमलकी एकादशी पर भक्त सुबह स्नान करके संकल्प लेते हैं। इसके बाद मंदिर या घर के पास स्थित आंवले के पेड़ को धूप, दीप, गंध और फूलों से पूजा जाता है।
- कलश स्थापना – पेड़ के नीचे एक कलश स्थापित किया जाता है, जिसमें भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर रखी जाती है।
- परिक्रमा – भक्त पेड़ की सात या इक्कीस बार परिक्रमा करते हैं।
- विशेष भोग – इस दिन भगवान को आंवला अर्पित करना अनिवार्य माना गया है।
क्या कहता है विज्ञान?
आंवले को ‘धात्री फल’ कहा गया है, जिसका अर्थ है ‘पालन करने वाली माता’। विज्ञान की दृष्टि से देखें तो आंवला विटामिन-C का सबसे बड़ा स्रोत है। बदलते मौसम (वसंत ऋतु के आगमन) के समय आंवले का पूजन और सेवन हमें आने वाली गर्मी और संक्रमणों के लिए तैयार करता है। इस वृक्ष से निकलने वाली शुद्ध ऑक्सीजन और औषधीय ऊर्जा मानसिक शांति प्रदान करती है।
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