हिन्दू धर्म में एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित सबसे पवित्र व्रतों में से एक माना जाता है। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को ‘आमलकी एकादशी’ (Amalaki Ekadashi) या ‘आंवला एकादशी’ के नाम से जाना जाता है। यह होली से कुछ दिन पहले आती है, इसलिए देश के कई हिस्सों में इसे ‘रंगभरी एकादशी’ के रूप में भी मनाया जाता है।
क्या आप जानते हैं कि यह एकमात्र ऐसी एकादशी है जिसमें भगवान विष्णु के साथ-साथ आंवले के वृक्ष (Amla Tree) की भी विशेष पूजा की जाती है? अगर आप पहली बार यह व्रत कर रहे हैं या घर पर पूजा की सरल विधि जानना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए है।
आमलकी एकादशी का महत्व
आमलकी एकादशी का महत्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक भी है। ‘आमलकी’ का अर्थ है ‘आंवला’। शास्त्रों के अनुसार, आंवले के वृक्ष की उत्पत्ति भगवान विष्णु के मुख से हुई थी, इसलिए इसमें त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का वास माना जाता है।
- पाप मुक्ति – मान्यता है कि इस दिन आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर पूजा करने से एक हजार गायों के दान (गोदान) के बराबर पुण्य मिलता है।
- वैज्ञानिक दृष्टिकोण – फाल्गुन मास में मौसम बदलता है (सर्दी से गर्मी की ओर)। आयुर्वेद के अनुसार, आंवला ‘अमृत फल’ है जो रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ाता है। इस व्रत के माध्यम से ऋषियों ने ऋतु परिवर्तन के दौरान स्वास्थ्य रक्षा का संदेश दिया है।
- रंगभरी एकादशी – काशी (वाराणसी) में मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव माता पार्वती का गौना कराकर पहली बार काशी लाए थे, इसलिए इसे रंगभरी एकादशी भी कहते हैं।
रंगभरी एकादशी शुभ मुहूर्त (Shubh Muhurat)
चूंकि हिंदू पंचांग तिथियां बदलती रहती हैं, 2026 के लिए सटीक समय अपने स्थानीय पंचांग में देखें, लेकिन सामान्यतः:
- फाल्गुन शुक्ल एकादशी की तिथि अत्यंत शुभ होती है। पूजा के लिए ‘ब्रह्म मुहूर्त’ (सूर्योदय से पहले) और ‘प्रदोष काल’ (सूर्यास्त के बाद) सबसे उत्तम माने जाते हैं।
- विशेष नोट – एकादशी का व्रत ‘दशमी’ की शाम से ही शुरू हो जाता है और ‘द्वादशी’ को पारण (व्रत खोलने) के साथ समाप्त होता है।
पूजन सामग्री की सूची (Puja Samagri List)
पूजा शुरू करने से पहले यह सामग्री एकत्रित कर लें ताकि पूजा के बीच में उठना न पड़े:
- भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र
- आंवले का वृक्ष (गमले में लगा पौधा या आंवले की टहनी)
- आंवले के फल (प्रसाद के लिए अनिवार्य)
- पीला कपड़ा (आसन के लिए)
- जल से भरा कलश
- धूप, दीप (घी का), अगरबत्ती
- पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, चीनी)
- तुलसी दल (विष्णु पूजा में अनिवार्य)
- चंदन, रोली, अक्षत (चावल)
- पीले फूल और मौसमी फल
रंगभरी एकादशी – घर पर पूजा की सरल विधि
यदि आपके घर के पास आंवले का बड़ा पेड़ नहीं है, तो आप घर पर ही गमले में लगे पौधे या आंवले की टहनी मंगाकर पूजा कर सकते हैं।
- प्रातः कालीन संकल्प – ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें। भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए हाथ में जल और फूल लेकर व्रत का संकल्प लें: “हे प्रभु, आज मैं आमलकी एकादशी का व्रत पूरी श्रद्धा से रखूंगा/रखूंगी। मेरी पूजा स्वीकार करें।”
- वेदी की स्थापना – घर के मंदिर या किसी साफ स्थान पर एक चौकी रखें। उस पर पीला कपड़ा बिछाएं। भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी की मूर्ति स्थापित करें। पास में ही एक कलश स्थापित करें और आंवले का फल या टहनी रखें।
- आंवले के वृक्ष का पूजन – अगर घर में आंवले का पौधा है, तो उसकी जड़ में कच्चा दूध और जल अर्पित करें। वृक्ष के तने पर रोली से तिलक करें, फूल चढ़ाएं और धूप-दीप दिखाएं। तने के चारों ओर 7 बार कच्चा सूत (मौली) लपेटकर परिक्रमा करें। यह सुख-समृद्धि का प्रतीक है।
- भगवान विष्णु की आराधना – भगवान विष्णु को चंदन का तिलक लगाएं। उन्हें पीले फूल और तुलसी दल अर्पित करें। आंवले का फल भोग के रूप में अवश्य चढ़ाएं। इसके बाद ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का 108 बार जाप करें।
- व्रत कथा और आरती – हाथ में अक्षत और फूल लेकर आमलकी एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें। कथा के बिना व्रत अधूरा माना जाता है। अंत में कपूर या घी के दीपक से विष्णु जी और आंवले के वृक्ष की आरती करें।
क्या करें और क्या न करें (Do’s and Don’ts)
- एकादशी के दिन चावल बनाना और खाना दोनों वर्जित है।
- इस दिन किसी न किसी रूप में आंवले का सेवन अवश्य करें (जैसे चूर्ण, जूस या चटनी), लेकिन यह द्वादशी (अगले दिन) को करना ज्यादा उत्तम है।
- मन, वचन और कर्म से शुद्ध रहें। किसी की निंदा न करें और क्रोध से बचें।
- संभव हो तो रात्रि में भजन-कीर्तन करें, इसे ‘जागरण’ कहते हैं, जो विशेष फलदायी है।
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