आंवला नवमी (अक्षय नवमी) की व्रत कथा व पूजा विधि PDF हिन्दी
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आंवला नवमी (अक्षय नवमी) की व्रत कथा व पूजा विधि हिन्दी Lyrics
आंवला नवमी, जिसे अक्षय नवमी भी कहा जाता है, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाई जाती है। ‘अक्षय’ का अर्थ है जिसका कभी क्षरण न हो, इसलिए इस दिन किए गए पुण्य और दान का फल अक्षय होता है।
इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व है, क्योंकि माना जाता है कि इसमें भगवान विष्णु और शिव का वास होता है। भक्त आंवले के पेड़ की पूजा करते हैं, परिक्रमा करते हैं और इसके नीचे बैठकर भोजन भी करते हैं। यह पर्व सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और संतान प्राप्ति की कामना के लिए शुभ माना जाता है। आंवला नवमी की पूजा विधि, कथा और महत्व की जानकारी आमतौर पर PDF फॉर्मेट में ऑनलाइन उपलब्ध होती है, जिसका उपयोग लोग व्रत और पूजा के नियमों को जानने के लिए करते हैं।
|| आंवला नवमी की पूजा विधि ||
- अक्षय नवमी के दिन आंवला वृक्ष की पूजा की जाती है।
- वृक्ष की हल्दी कुमकुम आदि से पूजा करके उसमें जल और कच्चा दूध अर्पित करें।
- इसके बाद आंवले के पेड़ की परिक्रमा करते हुए तने में कच्चा सूत या मौली आठ बार लपेटी जाती है।
- पूजा के बाद इसकी कथा पढ़ी और सुनी जाती है।
- पूजा खत्म होने के बाद परिवार और मित्रों आदि के साथ वृक्ष के नीचे बैठकर भोजन किए जाने का महत्व है।
|| अक्षय (आंवला) नवमी की व्रत कथा (Amla Navami Vrat Katha PDF) ||
अक्षय नवमी के संबंध में कथा है कि एक राजा था, उसका प्रण था वह रोज सवा मन आँवले दान करके ही खाना खाता था। इससे उसका नाम आँवलया राजा पड़ गया। एक दिन उसके बेटे बहु ने सोचा कि राजा इतने सारे आंवले रोजाना दान करते हैं , इस प्रकार तो एक दिन सारा खजाना खाली हो जायेगा। इसीलिए बेटे ने राजा से कहा की उसे इस तरह दान करना बंद कर देना चाहिए। बेटे की बात सुनकर राजा को बहुत दुःख हुआ और राजा रानी महल छोड़कर बियाबान जंगल में जाकर बैठ गये। राजा रानी आँवला दान नहीं कर पाए और प्रण के कारण कुछ खाया नहीं।
जब भूखे प्यासे सात दिन हो गए तब भगवान ने सोचा कि यदि मैने इसका प्रण नहीं रखा और इसका सत नहीं रखा तो विश्वास चला जायेगा। इसलिए भगवान ने, जंगल में ही महल, राज्य और बाग -बगीचे सब बना दिए और ढेरों आँवले के पेड़ लगा दिए। सुबह राजा रानी उठे तो देखा की जंगल में उनके राज्य से भी दुगना राज्य बसा हुआ है। राजा रानी से कहने लगा – रानी देख कहते हैं , सत मत छोड़े।
सूरमा सत छोड़या पत जाये, सत की छोड़ी लक्ष्मी फेर मिलेगी आय। आओ नहा धोकर आँवले दान करे और भोजन करे। राजा रानी ने आँवले दान करके खाना खाया और खुशी- खुशी जंगल में रहने लगे। उधर आंवला देवता का अपमान करने व माता पिता से बुरा व्यवहार करने के कारण बहु बेटे के बुरे दिन आ गए। राज्य दुश्मनो ने छीन लिया दाने-दाने को मोहताज हो गए और काम ढूंढते हुए अपने पिताजी के राज्य में आ पहुँचे। उनके हालात इतने बिगड़े हुए थे कि पिता ने उन्हें बिना पहचाने हुए काम पर रख लिया। बेटे बहु सोच भी नहीं सकते कि उनके माता-पिता इतने बड़े राज्य के मलिक भी हो सकते है सो उन्होंने भी अपने माता-पिता को नहीं पहचाना। एक दिन बहु ने सास के बाल गूँथते समय उनकी पीठ पर मस्सा देखा।
उसे यह सोचकर रोना आने लगा की ऐसा मस्सा मेरी सास के भी था। हमने ये सोचकर उन्हें आँवले दान करने से रोका था की हमारा धन नष्ट हो जायेगा। आज वे लोग न जाने कहाँ होगे ? यह सोचकर बहु को रोना आने लगा और आंसू टपक टपक कर सास की पीठ पर गिरने लगे। रानी ने तुरन्त पलट कर देखा और पूछा की , तू क्यों रो रही है ? उसने बताया आपकी पीठ जैसा मस्सा मेरी सास की पीठ पर भी था। हमने उन्हें आँवले दान करने से मना कर दिया था इसलिए वे घर छोड़कर कही चले गए। तब रानी ने उन्हें पहचान लिया। सारा हाल पूछा और अपना हाल बताया। अपने बेटे बहू को समझाया की दान करने से धन कम नहीं होता बल्कि बढ़ता है। बेटे बहु भी अब सुख से राजा रानी के साथ रहने लगे। हे भगवान ! जैसा राजा रानी का सत रखा वैसा सबका सत रखना। कहते सुनते सारे परिवार का सुख रखना।
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