चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को अशोक अष्टमी मनाई जाती है। यह पर्व विशेष रूप से पुनर्वसु नक्षत्र के संयोग में बहुत फलदायी माना जाता है। इस दिन भगवान शिव, माता पार्वती और अशोक वृक्ष की पूजा का विधान है। यहाँ अशोक अष्टमी व्रत की पौराणिक कथा और महत्व दिया गया है:
|| अशोक अष्टमी व्रत कथा ||
पौराणिक कथा के अनुसार, इस व्रत का संबंध रामायण काल से माना जाता है। जब रावण माता सीता का हरण कर उन्हें लंका ले गया था, तब उन्होंने अपना समय अशोक वाटिका में व्यतीत किया था।
माता सीता अत्यंत व्याकुल और दुखी थीं। प्रभु श्री राम के वियोग में वे दिन-रात शोक में डूबी रहती थीं। अशोक वाटिका में रहते हुए उन्होंने देखा कि जिस वृक्ष के नीचे वे बैठी हैं, वह ‘अशोक’ (अर्थात जो शोक को हर ले) है।
चैत्र शुक्ल अष्टमी के दिन माता सीता ने उस अशोक वृक्ष से प्रार्थना की और उसकी पूजा की। उन्होंने प्रार्थना की कि हे वृक्ष! जैसा तुम्हारा नाम है, वैसा ही तुम मेरे जीवन से भी सभी दुखों और शोक का नाश कर दो। माता सीता की इस भक्ति और धैर्य से प्रसन्न होकर इसी दिन उन्हें भगवान श्री राम के कुशल संदेश प्राप्त हुए थे और उनके दुखों के अंत की शुरुआत हुई थी।
एक अन्य मान्यता के अनुसार, रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए भगवान श्री राम ने भी इसी तिथि पर देवी शक्ति की आराधना की थी। इस व्रत के प्रभाव से उन्हें अजेय शक्ति प्राप्त हुई और उन्होंने अधर्म पर धर्म की विजय प्राप्त की।
|| अशोक अष्टमी व्रत की विधि ||
अशोक अष्टमी के दिन श्रद्धालु निम्नलिखित विधि का पालन करते हैं:
- इस दिन अशोक के वृक्ष की आठ कलियों (पत्तों या फूलों) का सेवन किया जाता है।
- पूजा करते समय इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है – त्वामशोक हराभीष्टं मधुमाससमुद्भव। पिबामि शोकसंतप्तो मामशोकं सदा कुरु ॥ (अर्थ – हे मधुमास में उत्पन्न और शोक को हरने वाले अशोक वृक्ष! मैं अपनी व्याकुलता दूर करने के लिए तेरा सेवन कर रहा हूँ, मुझे सदा के लिए शोकरहित कर दो।)
- इस दिन पवित्र नदियों में स्नान और सामर्थ्य अनुसार दान करने का विशेष महत्व है।
|| अशोक अष्टमी व्रत का महत्व ||
माना जाता है कि जो भी व्यक्ति इस दिन सच्चे मन से अशोक वृक्ष की पूजा करता है और व्रत कथा सुनता है:
- उसके जीवन से शोक और मानसिक कष्टों का नाश होता है।
- परिवार में सुख-शांति और आरोग्य का वास होता है।
- महिलाओं को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
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