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सिर्फ मोदक नहीं, यहाँ ‘खोज’ का भोग लगता है – ढुण्ढिराज चतुर्थी की अनसुनी महिमा

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यह कोई साधारण धार्मिक लेख नहीं है, बल्कि उस ‘गुमशुदा’ कड़़ी की तलाश है जिसे हम अक्सर त्योहारों की भीड़ में खो देते हैं। जब हम गणेश चतुर्थी की बात करते हैं, तो दिमाग में सबसे पहले चमक-धमक, बड़े पंडाल और भारी-भरकम मोदक आते हैं। लेकिन काशी की गलियों से निकली ‘ढुण्ढिराज चतुर्थी’ एक अलग ही कहानी कहती है।

यहाँ केवल पेट भरने के लिए मोदक नहीं चढ़ाया जाता, यहाँ अपनी ‘तलाश’ का नैवेद्य चढ़ाया जाता है। आइए, ढुण्ढिराज चतुर्थी की उस अनसुनी महिमा की गहराई में उतरते हैं जो शायद ही किसी मुख्यधारा की चर्चा में आपको मिले।

‘खोज’ का भोग – क्या है इसका आध्यात्मिक दर्शन?

ढुण्ढिराज चतुर्थी का मूल दर्शन ‘जिज्ञासा’ है। ‘ढुण्ढि’ का अर्थ ही है ढूँढना। पौराणिक काल में जब भगवान गणेश ने ज्योतिषी बनकर काशी के घर-घर में दस्तक दी थी, तब वह केवल लोगों की परेशानियाँ नहीं सुन रहे थे, बल्कि वह यह ‘ढूँढ’ रहे थे कि किस व्यक्ति के भीतर ईश्वर को पाने की सच्ची तड़प बची है।

इस चतुर्थी पर भक्तों के लिए एक गुप्त संदेश छिपा है: “भगवान को वह भक्त प्रिय नहीं जो केवल मांगता है, बल्कि वह प्रिय है जो सत्य को ढूँढता है।” इसलिए, इस दिन का असली ‘भोग’ आपकी वह मानसिक स्पष्टता है जिसे आप पाना चाहते हैं।

ढुण्ढिराज चतुर्थी – परंपराओं से परे कुछ अनसुने तथ्य

  • ‘अदृश्य’ गणेश की पूजा – मान्यता है कि ढुण्ढिराज चतुर्थी के दिन गणेश जी ‘अदृश्य’ रूप में भक्तों के बीच विचरण करते हैं। काशी की पुरानी मान्यताओं के अनुसार, इस दिन यदि आपको कोई राह चलता अजनबी सही सलाह दे दे या कोई छोटा बच्चा आपको सही रास्ता दिखा दे, तो उसे ढुण्ढिराज का ही संकेत माना जाता है।
  • 56 विनायक का ‘पावर हाउस’ – वाराणसी में 56 विनायक (गणेश जी के 56 रूप) हैं, जो सात घेरों में पूरी काशी की रक्षा करते हैं। ढुण्ढिराज इन सभी घेरों के अधिपति हैं। इस चतुर्थी पर उनकी पूजा करने का मतलब है—56 के 56 विनायकों की ऊर्जा को एक साथ सक्रिय करना।
  • ‘द्विजप्रिय’ और बुद्धि का समन्वय – इस चतुर्थी के विशेष स्वरूप को ‘द्विजप्रिय’ कहा जाता है। ‘द्विज’ का अर्थ है जिसका दूसरा जन्म हुआ हो (ज्ञान के माध्यम से)। यह दिन उन लोगों के लिए क्रांतिकारी है जो अपनी पुरानी आदतों को छोड़कर एक नया ‘बौद्धिक जन्म’ लेना चाहते हैं।

पूजा की वह विधि, जो किताबों में नहीं मिलती

आमतौर पर हम मंत्र पढ़ते हैं और दूर्वा चढ़ाते हैं, लेकिन ढुण्ढिराज चतुर्थी पर ‘मौन संवाद’ की एक विशेष परंपरा है:

  • प्रश्न अर्पण – इस दिन एक कोरे कागज पर अपनी वह उलझन या प्रश्न लिखें जिसे आप हल नहीं कर पा रहे हैं। इसे गणेश जी के चरणों में रखें। यह आपका ‘खोज का भोग’ है।
  • पीले तिल का रहस्य – इस दिन काले तिल की जगह ‘पीले तिल’ (या हल्दी से रंगे तिल) का उपयोग करें। पीला रंग बृहस्पति और गणेश दोनों का प्रतीक है, जो ज्ञान के द्वार खोलता है।
  • दिशा का ध्यान – पूजा करते समय अपना मुख उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) की ओर रखें, क्योंकि यह दिशा ब्रह्मांडीय ज्ञान की दिशा मानी जाती है।

2026 की ढुण्ढिराज चतुर्थी क्यों है खास?

वर्ष 2026 में यह चतुर्थी गुरुवार (5 फरवरी) को पड़ रही है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से, गुरुवार और गणेश चतुर्थी का संयोग ‘गजकेसरी’ जैसा फल देता है।

  • यह समय उन लोगों के लिए स्वर्णिम है जो नया व्यापार शुरू करना चाहते हैं।
  • जो छात्र अपनी विषय-शक्ति (Subject mastery) को ढूँढ रहे हैं, उनके लिए यह दिन ‘सिद्धि’ का है।

‘ढुण्ढिराज’ – एक अहसास, एक समाधान

ढुण्ढिराज चतुर्थी हमें सिखाती है कि हम बाहर चाहे जितने भी मोदक बांट लें, जब तक हम अपने भीतर के ‘भ्रम’ को खत्म करके ‘सत्य’ को नहीं ढूँढते, तब तक पूजा अधूरी है। काशी के विश्वनाथ मंदिर के पास बैठे ढुण्ढिराज गणेश आज भी हर भक्त से यही पूछते हैं – “तुम यहाँ क्या ढूँढने आए हो? शांति या सामान?”

संक्षेप में – ढुण्ढिराज चतुर्थी 2026 गाइड

  • मुख्य तिथि – 5 फरवरी 2026
  • विशेष भोग – पीला तिल, गुड़ और ‘सच्चा प्रश्न’
  • किसे पूजा करनी चाहिए? – जो करियर या जीवन में भ्रमित (Confused) हैं
  • प्रमुख मंत्र – ॐ ढुण्ढिराजाय नमः

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