भगवान गणेश, जो प्रथम पूज्य हैं और विघ्नहर्ता हैं, उनके भक्तों के लिए हर चतुर्थी एक उत्सव समान होती है। लेकिन ढुण्ढिराज चतुर्थी (जिसे पंचांग में द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है) का महत्व अत्यंत विशिष्ट है। विशेष रूप से काशी (वाराणसी) की परंपरा में ‘ढुण्ढिराज गणेश’ का स्थान सर्वोपरि है। मान्यता है कि जो भक्त जीवन की दिशा खोज रहे हैं या किसी संकट में ‘खो’ गए हैं, उन्हें ढुण्ढिराज गणेश सही मार्ग दिखाते हैं। वर्ष 2026 में यह पावन पर्व 21 फरवरी को मनाया जाएगा। आइए जानते हैं पूजा का शुभ मुहूर्त, विधि, और इस चतुर्थी के पीछे की पौराणिक कथा।
महत्वपूर्ण तिथियाँ और शुभ मुहूर्त (Dhoondhiraj Chaturthi 2026 Muhurat)
साल 2026 में फाल्गुन मास (अमांत पंचांग के अनुसार माघ) के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को यह व्रत रखा जाएगा।
- चतुर्थी तिथि – (दिनांक) 21 फरवरी 2026
- चतुर्थी तिथि आरंभ – 21 फरवरी, प्रात: 12:09 बजे (AM)
- चतुर्थी तिथि समापन – 22 फरवरी, प्रात: 12:22 बजे (AM)
- चंद्रोदय का समय – (Moonrise) रात्रि 09:35 बजे (अनुमानित)
- ब्रह्म मुहूर्त – प्रात: 05:22 से 06:15 तक
- अभिजीत मुहूर्त – (पूजा के लिए श्रेष्ठ) दोपहर 12:13 से 12:57 तक
- ध्यान दें – चंद्रोदय का समय आपके शहर की भौगोलिक स्थिति के अनुसार 10-15 मिनट आगे-पीछे हो सकता है। कृपया अपने स्थानीय पंचांग या ऐप से सटीक समय की पुष्टि करें।
ढुण्ढिराज गणेश का महत्व – क्यों खास है यह चतुर्थी?
‘ढुण्ढि’ शब्द का अर्थ है ‘खोजना’। काशी खंड की कथाओं के अनुसार, भगवान गणेश यहाँ ‘ढुण्ढिराज’ के रूप में विराजमान हैं।
- रास्ता खोजने वाले देव – यदि आप जीवन में करियर, विवाह या किसी निर्णय को लेकर दुविधा में हैं, तो ढुण्ढिराज गणेश की पूजा मानसिक स्पष्टता (Clarity) प्रदान करती है।
- खोई हुई वस्तुओं की प्राप्ति – लोक मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से प्रार्थना करने पर खोई हुई वस्तुएं या बिछड़े हुए लोग वापस मिल जाते हैं।
- द्विजप्रिय स्वरूप – इस चतुर्थी के देवता ‘द्विजप्रिय’ गणेश हैं, जिसका अर्थ है ‘ब्राह्मणों या ज्ञानियों के प्रिय’। यह दिन विद्यार्थियों और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए अत्यंत शुभ है।
ढुण्ढिराज चतुर्थी पूजा विधि
इस व्रत का पूर्ण फल तभी मिलता है जब इसे सही विधि-विधान से किया जाए। यहाँ पूजा की सरल और प्रामाणिक विधि दी गई है:
- सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और स्वच्छ पीले या लाल वस्त्र धारण करें। हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर व्रत का संकल्प लें: “हे ढुण्ढिराज गणेश! मैं (अपना नाम) आज आपके निमित्त संकष्टी चतुर्थी का व्रत धारण कर रहा/रही हूँ। मेरे जीवन के समस्त विघ्नों को दूर कर मुझे सही मार्ग दिखाएं।”
- घर के मंदिर में गणेश जी की मूर्ति को पंचामृत (दूध, दही, शहद, घी, शक्कर) और गंगाजल से स्नान कराएं।
- गणपति को दूर्वा (घास) अति प्रिय है। 21 दूर्वा की गांठें अर्पित करें। सिंदूर का तिलक लगाएं और लाल फूल (गुड़हल) चढ़ाएं।
- मोदक या बेसन के लड्डू का भोग लगाएं। साथ ही तिल और गुड़ का नैवेद्य भी अर्पण करें। धूप-दीप जलाकर गणेश अथर्वशीर्ष या संकष्ट नाशन गणेश स्तोत्र का पाठ करें।
- शाम को पुनः स्नान या हाथ-पैर धोकर पूजा करें। चंद्रमा के उदय होने पर, आकाश की ओर मुख करके जल, चंदन, अक्षत और दूध का मिश्रण एक लोटे में लें।
- चंद्रमा को अर्घ्य देते समय यह मंत्र बोलें: “गगनार्णवमाणिक्य चन्द्र दाक्षायणीपते। गृहाणार्घ्यं मया दत्तं गणेशप्रतिरूपक॥”
(अर्थ: हे गगन रूपी समुद्र के माणिक्य, दक्ष कन्या रोहिणी के पति और गणेश के प्रतिरूप चन्द्रमा! मेरे द्वारा दिया गया यह अर्घ्य स्वीकार करें।) अंत में, गणेश जी की आरती करें और परिवार में प्रसाद बांटकर अपना व्रत खोलें।
पौराणिक कथा – जब गणेश बने ‘ढुण्ढिराज’
काशी खंड की एक रोचक कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव काशी से दूर मंदराचल पर्वत पर रहने लगे थे। काशी नरेश दिवोदास ने कठोर तपस्या से देवताओं को काशी में प्रवेश करने से रोक दिया था। भगवान शिव काशी वापस आना चाहते थे, लेकिन राजा दिवोदास की तपस्या भंग करना आसान नहीं था।
तब भगवान शिव ने गणेश जी को काशी भेजा। गणेश जी ने एक ज्योतिषी का वेश धरा और अपना नाम ‘ढुण्ढि’ बताया। उन्होंने राजा दिवोदास और प्रजा के मन में धीरे-धीरे ऐसा प्रभाव डाला कि राजा को वैराग्य हो गया और उन्होंने स्वयं ही काशी का त्याग कर दिया, जिससे भगवान शिव पुनः काशी में वास कर सके।
चूंकि गणेश जी ने शिव जी के लिए काशी को पुनः ‘खोजा’ या मार्ग प्रशस्त किया, इसलिए शिव जी ने उन्हें वरदान दिया कि काशी में प्रवेश करने से पहले भक्तों को ढुण्ढिराज गणेश के दर्शन करने होंगे। इस चतुर्थी पर इसी ‘खोजने वाले’ स्वरूप की पूजा होती है।
क्या करें और क्या न करें (Do’s and Don’ts)
क्या करें
- इस दिन ‘ॐ गं गणपतये नमः’ का कम से कम 108 बार जाप करें।
- गायों को हरा चारा खिलाएं।
- यदि संभव हो तो तिल का दान करें।
क्या न करें
- इस दिन तुलसी पत्र गणेश जी को भूलकर भी न चढ़ाएं।
- चंद्रोदय से पहले भोजन ग्रहण न करें (यदि पूर्ण व्रत है)।
- घर में क्लेश या क्रोध से बचें, यह व्रत शांति का प्रतीक है।
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