माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी कहा जाता है। वर्ष 2026 में जया एकादशी का पावन व्रत 28 जनवरी, बुधवार को रखा जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को करने से व्यक्ति को नीच योनि जैसे कि भूत-प्रेत या पिशाच योनि से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। जया एकादशी की पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु की कृपा से माल्यवान नामक गंधर्व को पिशाच योनि से मुक्ति मिली थी।
इस दिन भगवान श्री विष्णु के ‘माधव’ स्वरूप की पूजा की जाती है। इस व्रत के प्रभाव से भक्त के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। यदि आप इस व्रत की संपूर्ण विधि, पूजन सामग्री और पौराणिक कथा विस्तार से पढ़ना चाहते हैं, तो Jaya Ekadashi Vrat Katha PDF हमारी वेबसाइट से डाउनलोड करें।
|| जया एकादशी की पूजा विधि ||
- इस दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करें और घर की पूरी साफ-सफाई करें। झाड़ू-पोंछा लगाने के बाद पूरे घर में गौमूत्र का छिड़काव करें। इसके पश्चात शरीर पर तिल एवं मिट्टी का लेप लगाकर कुशा से स्नान करें।
- घर के पूजा स्थल या पूर्व दिशा में किसी स्वच्छ स्थान पर गौमूत्र छिड़ककर वहां गेहूं रखें। फिर उस पर तांबे के लोटे (कलश) को जल से भरकर रखें। लोटे के ऊपर अशोक के पत्ते या डंठल सहित पान रखें और नारियल स्थापित करें। इस प्रकार कलश की स्थापना करें।
- इसके बाद कलश के समीप भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करें और विधिपूर्वक कलश एवं भगवान विष्णु की पूजा करें। दीप जलाकर भजन-कीर्तन करें।
- दिनभर व्रत का पालन करें और अगले दिन विधिपूर्वक कलश विसर्जन करें। कलश के जल को पूरे घर में छिड़कें और शेष जल को तुलसी में अर्पित करें। इस प्रकार जया एकादशी व्रत पूर्ण करें।
|| जया एकादशी व्रत कथा (Jaya Ekadashi Vrat Katha PDF) ||
एक समय इंद्र अपनी इच्छानुसार नंदन वन में अप्सराओं के साथ विहार कर रहे थे और गंधर्व गान कर रहे थे। उन गंधर्वों में प्रसिद्ध पुष्पदंत तथा उसकी कन्या पुष्पवती और चित्रसेन तथा उसकी स्त्री मालिनी भी उपस्थित थे। साथ ही मालिनी का पुत्र पुष्पवान और उसका पुत्र माल्यवान भी उपस्थित थे।
पुष्पवती गंधर्व कन्या माल्यवान को देखकर उस पर मोहित हो गई और माल्यवान पर काम-बाण चलाने लगी। उसने अपने रूप लावण्य और हावभाव से माल्यवान को वश में कर लिया। हे राजन्! वह पुष्पवती अत्यन्त सुंदर थी। अब वे इंद्र को प्रसन्न करने के लिए गान करने लगे परंतु परस्पर मोहित हो जाने के कारण उनका चित्त भ्रमित हो गया था।
इनके ठीक प्रकार न गाने तथा स्वर ताल ठीक नहीं होने से इंद्र इनके प्रेम को समझ गया और उन्होंने इसमें अपना अपमान समझ कर उनको शाप दे दिया। इंद्र ने कहा हे मूर्खों ! तुमने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है, इसलिए तुम्हारा धिक्कार है। अब तुम दोनों स्त्री-पुरुष के रूप में मृत्यु लोक में जाकर पिशाच रूप धारण करो और अपने कर्म का फल भोगो।
इंद्र का ऐसा शाप सुनकर वे अत्यन्त दु:खी हुए और हिमालय पर्वत पर दु:खपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करने लगे। उन्हें गंध, रस तथा स्पर्श आदि का कुछ भी ज्ञान नहीं था। वहाँ उनको महान दु:ख मिल रहे थे। उन्हें एक क्षण के लिए भी निद्रा नहीं आती थी।
उस जगह अत्यन्त शीत था, इससे उनके रोंगटे खड़े रहते और मारे शीत के दाँत बजते रहते। एक दिन पिशाच ने अपनी स्त्री से कहा कि पिछले जन्म में हमने ऐसे कौन-से पाप किए थे, जिससे हमको यह दु:खदायी पिशाच योनि प्राप्त हुई। इस पिशाच योनि से तो नर्क के दु:ख सहना ही उत्तम है। अत: हमें अब किसी प्रकार का पाप नहीं करना चाहिए। इस प्रकार विचार करते हुए वे अपने दिन व्यतीत कर रहे थे।
दैव्ययोग से तभी माघ मास में शुक्ल पक्ष की जया नामक एकादशी आई। उस दिन उन्होंने कुछ भी भोजन नहीं किया और न कोई पाप कर्म ही किया। केवल फल-फूल खाकर ही दिन व्यतीत किया और सायंकाल के समय महान दु:ख से पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गए। उस समय सूर्य भगवान अस्त हो रहे थे। उस रात को अत्यन्त ठंड थी, इस कारण वे दोनों शीत के मारे अति दुखित होकर मृतक के समान आपस में चिपटे हुए पड़े रहे। उस रात्रि को उनको निद्रा भी नहीं आई।
हे राजन् ! जया एकादशी के उपवास और रात्रि के जागरण से दूसरे दिन प्रभात होते ही उनकी पिशाच योनि छूट गई। अत्यन्त सुंदर गंधर्व और अप्सरा की देह धारण कर सुंदर वस्त्राभूषणों से अलंकृत होकर उन्होंने स्वर्गलोक को प्रस्थान किया। उस समय आकाश में देवता उनकी स्तुति करते हुए पुष्पवर्षा करने लगे। स्वर्गलोक में जाकर इन दोनों ने देवराज इंद्र को प्रणाम किया। इंद्र इनको पहले रूप में देखकर अत्यन्त आश्चर्यचकित हुआ और पूछने लगा कि तुमने अपनी पिशाच योनि से किस तरह छुटकारा पाया, सो सब बतालाओ।
माल्यवान बोले कि हे देवेन्द्र ! भगवान विष्णु की कृपा और जया एकादशी के व्रत के प्रभाव से ही हमारी पिशाच देह छूटी है। तब इंद्र बोले कि हे माल्यवान! भगवान की कृपा और एकादशी का व्रत करने से न केवल तुम्हारी पिशाच योनि छूट गई, वरन् हम लोगों के भी वंदनीय हो गए क्योंकि विष्णु और शिव के भक्त हम लोगों के वंदनीय हैं, अत: आप धन्य है। अब आप पुष्पवती के साथ जाकर विहार करो।
इस जया एकादशी के व्रत से बुरी योनि छूट जाती है। जिस मनुष्य ने इस एकादशी का व्रत किया है उसने मानो सब यज्ञ, जप, दान आदि कर लिए। जो मनुष्य जया एकादशी का व्रत करते हैं वे अवश्य ही हजार वर्ष तक स्वर्ग में वास करते हैं।
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