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हजारों वर्षों की तपस्या के समान है जया एकादशी का व्रत – जानें इसका महत्व और पौराणिक कथा।

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हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष स्थान है, लेकिन माघ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली ‘जया एकादशी’ को अत्यंत कल्याणकारी और फलदायी माना गया है। शास्त्रों में वर्णित है कि इस एक दिन का व्रत रखने से व्यक्ति को पिशाच योनि से मुक्ति मिलती है और उसे हजारों वर्षों की कठिन तपस्या के समान पुण्य प्राप्त होता है।

वर्ष 2026 में जया एकादशी के इस पावन अवसर पर, आइए जानते हैं इसका आध्यात्मिक महत्व, शुभ मुहूर्त और वह पौराणिक कथा जो हमें धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।

जया एकादशी का आध्यात्मिक महत्व

जया एकादशी केवल एक उपवास नहीं, बल्कि आत्मा के शुद्धिकरण का मार्ग है। पद्म पुराण के अनुसार, जो भक्त इस दिन पूर्ण निष्ठा के साथ भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, उन्हें न केवल मानसिक शांति मिलती है, बल्कि उनके अनजाने में किए गए पापों का भी नाश होता है।

  • ‘जया’ का अर्थ है विजय। यह व्रत व्यक्ति को अपनी इंद्रियों और आंतरिक विकारों (काम, क्रोध, लोभ) पर विजय प्राप्त करने में मदद करता है।
  • मान्यता है कि यदि कोई व्यक्ति जाने-अनजाने में प्रेत योनि के संकट में हो, तो इस व्रत के प्रभाव से उसे उत्तम लोक की प्राप्ति होती है।
  • धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख है कि जया एकादशी का फल कई हजार वर्षों की तपस्या और बड़े-बड़े यज्ञों के समान है।

जया एकादशी की पौराणिक कथा

जया एकादशी की महिमा को समझाने वाली कथा इंद्र की सभा से जुड़ी है। स्वर्ग लोक में देवराज इंद्र के दरबार में ‘माल्यवान’ नामक एक गंधर्व और ‘पुष्पवती’ नामक एक अप्सरा रहती थी। दोनों ही गायन और नृत्य की कला में निपुण थे। एक बार इंद्र की सभा में प्रदर्शन करते समय दोनों एक-दूसरे पर मोहित हो गए और उनका ध्यान भटक गया। लय-ताल बिगड़ने के कारण देवराज इंद्र अत्यंत क्रोधित हो गए।

क्रोधवश इंद्र ने उन्हें शाप दिया, “तुमने संगीत जैसी पवित्र विधा का अपमान किया है, इसलिए तुम दोनों स्वर्ग से च्युत होकर मृत्युलोक (पृथ्वी) पर पिशाच योनि में जन्म लोगे और दुख भोगोगे।”

शाप के प्रभाव से दोनों हिमालय की दुर्गम पहाड़ियों पर पिशाच के रूप में रहने लगे। उनका जीवन अत्यंत कष्टकारी था; उन्हें न नींद आती थी, न ही उन्हें भोजन मिलता था। ठंड और भूख से व्याकुल होकर वे अपने किए पर पश्चाताप करने लगे।

माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन संयोगवश दोनों इतने दुखी थे कि उन्होंने पूरे दिन कुछ नहीं खाया और न ही रात भर सो पाए। वे केवल भगवान का स्मरण करते रहे और ठंड के कारण पूरी रात जागते रहे। अनजाने में उनसे ‘जया एकादशी’ का निर्जला व्रत संपन्न हो गया।

इस कठिन व्रत के प्रभाव से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और अगले ही दिन सुबह होते ही माल्यवान और पुष्पवती को पिशाच योनि से मुक्ति मिल गई। वे पुनः अपने दिव्य रूप में स्वर्ग लोक लौट आए। जब इंद्र ने उन्हें देखा, तो वे चकित रह गए। तब माल्यवान ने बताया कि यह भगवान विष्णु की कृपा और जया एकादशी के व्रत का प्रभाव है।

जया एकादशी पूजन विधि

यदि आप इस व्रत का पूर्ण लाभ लेना चाहते हैं, तो विधि-विधान का पालन अनिवार्य है:

  • सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और भगवान विष्णु के समक्ष हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।
  • भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर को पीले फूल, पीले वस्त्र, चंदन और अक्षत अर्पित करें।
  • भगवान को तुलसी दल (तुलसी का पत्ता) अवश्य चढ़ाएं, क्योंकि इसके बिना विष्णु जी भोग स्वीकार नहीं करते।
  • दिन भर ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का मानसिक जप करें।
  • एकादशी की रात को सोना नहीं चाहिए। भजन-कीर्तन करते हुए जागरण करना श्रेष्ठ माना जाता है।
  • अगले दिन यानी द्वादशी को शुभ मुहूर्त में किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को दान-दक्षिणा देकर व्रत खोलें।

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