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क्यों मनाया जाता है पोंगल? सूर्य देव के प्रति आभार प्रकट करने वाले इस त्यौहार की पूरी कहानी।

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भारत विविधताओं का देश है, जहाँ हर मौसम और फसल के आगमन का अपना एक उत्सव होता है। दक्षिण भारत, विशेष रूप से तमिलनाडु में, ‘पोंगल’ का त्यौहार केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, पशुओं और सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का एक महापर्व है।

जब उत्तर भारत में मकर संक्रांति और पंजाब में लोहड़ी की धूम होती है, तब दक्षिण भारत पोंगल के रंग में रंगा होता है। आइए जानते हैं इस चार दिवसीय उत्सव की पूरी कहानी और इसके पीछे का गहरा महत्व।

पोंगल का अर्थ और महत्व

‘पोंगल’ शब्द तमिल शब्द ‘पुंगु’ से आया है, जिसका अर्थ होता है – ‘उबालना’ या ‘उफान’। पारंपरिक रूप से, नए कटे हुए चावलों को दूध और गुड़ के साथ मिट्टी के बर्तन में उबाला जाता है। जब यह मिश्रण बर्तन से बाहर गिरने लगता है, तो उसे शुभ माना जाता है और लोग खुशी से चिल्लाते हैं – “पोंगल-ओ-पोंगल!”। यह उफान जीवन में सुख, समृद्धि और प्रचुरता का प्रतीक है।

पोंगल क्यों मनाया जाता है?

इस त्यौहार के पीछे दो प्रमुख पौराणिक कहानियाँ प्रचलित हैं, जो हमें जीवन के मूल्यों और प्रकृति के सम्मान की सीख देती हैं:

1. भगवान शिव और उनके बैल बसवा की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव ने अपने बैल बसवा को पृथ्वी पर एक संदेश लेकर भेजा। शिव ने कहा था, “मनुष्यों से कहो कि वे हर दिन तेल से स्नान करें और महीने में केवल एक बार भोजन करें।”

लेकिन बसवा ने गलती से संदेश उल्टा कह दिया – “हर दिन भोजन करें और महीने में एक बार तेल से स्नान करें।” इससे क्रोधित होकर शिव ने बसवा को शाप दिया कि उसे पृथ्वी पर रहकर किसानों की हल जोतने में मदद करनी होगी ताकि वे अधिक अन्न उपजा सकें। यही कारण है कि पोंगल पर मवेशियों (खासकर बैलों) की पूजा की जाती है।

2. इंद्र देव का अहंकार और भगवान कृष्ण

एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान कृष्ण ने गोकुल के लोगों को देवराज इंद्र की पूजा करने के बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा करने के लिए प्रेरित किया। इससे इंद्र देव क्रोधित हो गए और मूसलाधार बारिश शुरू कर दी। तब कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाकर लोगों की रक्षा की। अंततः इंद्र को अपनी गलती का अहसास हुआ। पोंगल का पहला दिन (भोगी) इंद्र देव को समर्पित है, जो अहंकार के त्याग का प्रतीक है।

चार दिनों का भव्य उत्सव

पोंगल का त्यौहार पूरे चार दिनों तक चलता है, और हर दिन का अपना एक विशेष महत्व है:

  1. भोगी पोंगल (Bhogi Pongal) – यह उत्सव का पहला दिन है। इस दिन लोग अपने घरों की सफाई करते हैं और पुरानी, अनुपयोगी वस्तुओं को आग में जलाते हैं। यह ‘बुराई के त्याग’ और ‘नयी शुरुआत’ का प्रतीक है। यह दिन वर्षा के देवता इंद्र को समर्पित है।
  2. सूर्य पोंगल (Surya Pongal) – यह मुख्य पोंगल है। इस दिन सूर्य देव की पूजा की जाती है। आँगन में नए मिट्टी के बर्तन में ‘पोंगल’ (चावल और गुड़ का प्रसाद) बनाया जाता है। जैसे ही चावल उबलते हैं, सूर्य देव को अर्पित किए जाते हैं।
  3. मट्टू पोंगल (Mattu Pongal) – यह दिन पशुधन, विशेषकर गायों और बैलों को समर्पित है। किसान अपने बैलों को नहलाते हैं, उनके सींगों को रंगते हैं और उन्हें माला पहनाते हैं। कृषि में उनकी सहायता के लिए उनका आभार व्यक्त किया जाता है।
  4. कानुम पोंगल (Kaanum Pongal) – यह परिवार और मेल-मिलाप का दिन है। लोग अपने रिश्तेदारों से मिलने जाते हैं, उपहारों का आदान-प्रदान करते हैं और सामूहिक रूप से खुशियाँ मनाते हैं।

पोंगल का वैज्ञानिक और सामाजिक आधार

पोंगल केवल धार्मिक नहीं, बल्कि खगोलीय और वैज्ञानिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। यह समय सूर्य के उत्तरायण होने का होता है, जिससे दिन लंबे होने लगते हैं और फसल की कटाई शुरू होती है। यह त्यौहार हमें सिखाता है कि हम जो कुछ भी उपभोग करते हैं, उसके पीछे प्रकृति और पशुओं का अथक परिश्रम है।

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